Wednesday, 9 August 2017

आलेख सं : ४

शीर्षक : "जीवन का म........र्म"
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समाज में प्रतिष्ठा नामक शब्द का ऐसा रूप प्रस्तुत किया गया कि मनुष्य अपने दिल की कम और दिमाग की ज्यादा सुनता हैं । समाज के ही कुछ कथित समाजसेवी ठेकेदारों ने प्रतिष्ठा को शान रुपी आडंबर में इस तरह से घुला दिया हैं कि दोनों में अंतर करना मुश्किल प्रतीत होता हैं ।

इस आडंबर ने समाज को अपने भुजाओं में ऐसे  जकड़ लिया हैं कि समाज की पूरी की पूरी जन-समूह  प्रतिष्ठा पाने की चाह में कड़वाहटों को अपने जीवन में घोलने से भी परहेज नहीं करती । प्रतिष्ठा के आँचल को समाज ने इस तरह से उपयोग किया हैं जिससे समाज की संरचना पर ही बुरा असर पड़ने की प्रबल सम्भावना हैं ।

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प्रतिष्ठा कुछ और नहीं बल्कि प्रेम का ही एक पवित्र स्वरूप हैं, लेकिन इसके मर्म को समझने के लिए सरलता पहली शर्त हैं । समाज का ताना-बाना प्रेम के डोर से ही बंधी हैं, मानव को उसके दो रूपों में से एक समय पर एक रूप को चुनना होता हैं - ज्ञान का उजाला या अज्ञान का अंधियारा ।

ज्ञान, संवेदनाओ के छत्रछाया में अपने पौध रूप  को वटवृक्ष में विकसित करने में सक्षम हो पाती हैं वही अज्ञान कोरी संवेदनाओ के साए में डर, भ्रम और अविश्वास को अपने साथ जीने को विवश होती हैं ।

ज्ञान जीवन की वह लहर हैं जो स्वयं के आने से पहले मनुष्य को सरलता, विवेकशीलता, सहिष्णुता, प्रेम आदि से सीधा साक्षात्कार करवाता हैं जबकि अज्ञान वह किनारा हैं जो अपने में घमंड, असहिष्णुता, क्रोध, लोभ इत्यादि को आश्रय देता हैं ।

आदिकाल में मनुष्य के प्रतिष्ठा का अनुमान पशुधन की संख्या से निर्धारित की जाती थी, समय के साथ उसका स्थान स्वर्ण मुद्राओं ने ले लिया । आज के आधुनिक कल में प्रतिष्ठा का निर्धारण लक्ज़री गाड़िया, वैभवशाली भवनों इत्यादि ने ले लिया हैं जिसमें सरलता का कोई योगदान नहीं ।

लेकिन सरलता के बिना जीवन आनंदायी भी नहीं हो सकता । मानव जब तक तृष्णा को संतोष की बूँदो से तृप्त नहीं कर लेता तब तक जीवन उसके खुशियों पर अपनी चाबुक ऐसे ही चलाता रहेगा ।

मानव के लिए दैनिक जीवन में हँसते रहना बहुत ही सरल हैं मगर सरल बने रहना उतना ही कठिन । स्थितियां मनुष्य को कठिन या जिद्दी बनाती हैं जिसके कारण वह स्वयं के दिल की नहीं सुनता । लेकिन साहस ही वह उत्प्रेरक हैं जो मनुष्य को सरलता की ओर बार-बार आकर्षित करता हैं जैसे समुद्र की लहरे बार-बार किनारों को पास आकर अपनी ओर आकृष्ट करती हैं  ।

कोमल मन ने यह मनुष्य पर छोड़ दिया हैं कि वह प्रेम के किस रूप को अपने जीवन में लाना चाहता हैं, यदि ज्ञान को अपने जीवन में साथ लाये तो सरलता स्वयं आएंगी और यदि अज्ञान को आश्रय देना जारी रखेगी तो कठिनता अपना पैर जरूर पसारेगी ।

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राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला), बिहार
दिनांक०९/०८/२०१७

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