Monday, 3 July 2017

आलेख सं : ३

शीर्षक : "प्रेम में...."
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ईश्वरीय शक्ति द्वारा जब कभी सृष्टि की रचना की गई होंगी सर्वप्रथम प्रेम का संचरण उसी बेला में संभवतः हुआ होगा क्योकि हम इंसान उसी ईश्वरीय शक्ति के ही तो पुत्र-पुत्री हैं । किसी भी वस्तु के सृजन से पहले मनुष्य के मस्तिष्क में उस वस्तु की रचना का विचार आता हैं फिर अपने द्वारा की गए कल्पना के माध्यम से काल्पनिक रचना को मूर्त रूप देने का भाव आता हैं और तत्क्षण ही मनुष्य के मन में आकर्षण जन्म लेता है और यही आकर्षण लगाव और लगाव कब किसी वस्तु के प्रति प्रेम में बदल जाता हैं पता ही नहीं चलता, ठीक ऐसे ही विचार हमारे मन में किसी को प्रेम करने से पहले आता हैं। 

प्रेम उस विधा की जननी हैं जिसे अपने नैनिहाल से पाने से पहले स्वयं नैनिहाल से प्रेम करना पड़ता हैं जो निरन्तर चलता रहना चाहिए अर्थात प्रेम ऐसी विधा हैं जिसमे दुसरों को सीखाने से पहले स्वयं भी निरन्तर सीखने का अभ्यस्त होना पड़ता हैं । जैसे एक शिक्षक अपने छात्रों को कोई पाठ पाठन करवाने से पहले स्वयं उसको अछि तरह जनता हो और पाठन कराने के क्रम में उस विषय के गूढ़ रहस्यो को बड़ी सहजता से स्वयं भी समझ ले और अपने छात्रों को भी लाभान्वित कर पाए ।

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प्रेम शब्द ही प्रकार्यवाद (Functionalism) की प्रक्रिया हैं क्योंकि हृदय में किसी के लिए प्रेम का बीज बोने मात्रा से आत्मा में उमगता का संचरण कुलाचे मारने लगता हैं । प्रेम में होना सीखने की प्रक्रिया है इसमें कोई दोराय नहीं, जब हम प्रेम में होते हैं तो अपनी हर गलत आदत को छोड़ने को तैयार नजर आते हैं और जिन चीजों से हम प्रेम के पास खड़े हो पाए उसे अपने में आत्मसात करने को प्रयासरत होते हैं अर्थात सिखने को अग्रसर रहते हैं ।

प्रेम मनुष्य को सरल, मृदुलभाषी, सत्यनिष्ठ  करुणामयी आदि जैसे भावो से ओत-प्रोत कर देता हैं, यह सब एक दिन में यह सब सहजता से नहीं सीखा जा सकता हैं, उसके लिए वर्षो तक पौधे रुपी शिशु को उसके माँ-बाप और समाज द्वारा सिचा जाता हैं । किसी दुष्ट द्वारा इसे दो-चार दिन में सीखा भी नहीं जा सकता क्योकि सरलता को जीना बड़ा कठिन कार्य हैं ।

सरलता को आत्मसात करने के लिए सबसे पहले हमे त्याग, संवेदनशीलता, निश्छलता, करुणा इत्यादि के मर्म को समझना अत्यावश्यक हैं, क्योंकि जीवन को सफल बनाने के लिए हमे असंवेदनशीलता से संवेदनशीलता की ओर बढ़ना पड़ता हैं और संवेदनशील होने के लिए करुणा के करीब जाना पड़ता हैं और करुणा प्रेम की छत्र-छाया में पल्लवित होती हैं । यहाँ जीवन के सफल का तात्पर्य सुख-शांति और प्रसन्नचित आत्मा से हैं न की धन-सम्पति से ।

प्रेम का हमारे जीवन में होना मात्रा हमारे मन-मस्तिष्क में नित कुछ नया सीखने की ललक उदीप्त कर देती हैं और यह हमारे बढ़ने की सोच को उड़ने को पंख लगा देता हैं । एक बार इसकी सवारी कर ली फिर तो सीखते ही जाना । सीखने के लिए जरुरी हैं की हम बच्चे की तरह सहजता से अपने मन के कोने में बैठे सरलता को ढूँढने का प्रयास करे ।

जीवन के हर चरण में मनुष्य का प्रेम में होना उसके सफल होने की कहानी बयां करती हैं, इसीलिए प्रेम में अपने जीवन को सरोबार कर के देखिये में सिखने का क्रम जारी रहेगा, लेकिन शर्त बस इतना हैं कि प्रेम को बल मन की तरह निश्छल रहने दें ।

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राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला ), बिहार। 
दिनांक०३/०७ /२०१७
  
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