Sunday, 18 June 2017

"फिर से"

लघु कथा सं१३  
शीर्षक-"फिर से"~~~
-------------------------------------------------------------------------------------------------

मैं दालान पर बैठी सूरज की लालिमा को निहार ही रही थी । अनुराधा के दरवाजे के सामने एक कार आकर रुकी जैसे ही उसमे बैठे लोगो को उनको अनुराधा के घर में प्रवेश करते देखा तो एकाएकमुझे ध्यान आया अनुराधा की माँ ने मुझे भी तो किन्ही विशेष लोगो से मिलवाने को बुलाया था । मैं अनुराधा के माँ के उम्र की होते हुए भी उसकी सहेली जैसी थी जिससे वो अपने सुख-दुःख दोनों तरह की बातें बचपन से साझा करती आयी थी, वह मेरी बेटी न होते हुए भी मेरी बेटी थी ।  

मैं फटाफट तैयार हुई और अजनबियों से मिलने के लिए धीर होते हुए भी अधीर हुए जा रही थी, इसी भावावेश में मेरे मन ने अनुराधा के घर की ओर अपने कदमों को गति दे दी । मैंने जैसे ही हॉल में प्रवेश किया  सामने अजनबियों को देखा उत्सुकता से भरे मन अतिथियों को देख रहे थे की राजेश बाबू ने बैठने को आग्रह किया । फिर उन्होंने आये अतिथी से परिचय करवाते हुए कहा ये मेरे बचपन के मित्र सुशील जी, इनकी पत्नी और इनका पुत्र आदित्य जो मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हैं आज विशेष रूप से मिलने आये हैं । 

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

राजेश बाबू ने मुझसे कहा सुशील बाबू अनुराधा को अपने घर की बहु बनाना चाहते हैं, मैं थोड़ी विस्मित थी मगर स्वयं की भावना पर काबू पाते हुए बातें करने में तल्लीन हो गई तभी अचानक अनुराधा को दरवाजे की ओट से आदित्य को निहारते देखा । उसकी हिरणी सी आँखे आदित्य से शायद यही कहना चाहती हो तुम मुझसे क्यों शादी करना चाहते हों, जबकि मै खुद मुरझाई हुई फूल हूँ तुम्हारे बगिया को कैसे महका पाऊँगी । जैसे ही उसकी डब-डबयी आँखों से मेरी आँखे मिली, उसके चेहरे पर और न ही होंठों पर ही कोई हरकत हुई वो रुंधे मन से अन्दर भागी ।

जब मैं उसके पास गई तो देखा बिना किसी भाव के उसके आँसू तकिये में समाये जा रही थी । मेरे पहुंचते ही वो गले से लिपटकर ऐसे रोई कि मैं भी संभल न पायी । किसी तरह उसके आंसुओं ने अपने को संभाला, तो मैंने उसे एक बार आदित्य से मिल लेने को कहा तो बहुत मान-मौनव्ल के बाद वह मान गई । मैंने उसे फटा-फट तैयार हो कर आने को कहा तो उसने अपनी सहमति दे दी ।

कुछ देर बाद जैसे ही उसने दस्तक दी, हॉल में बैठे सब लोग एक टक उसे ही निहारते रह गए । कुछ देर आदित्य और अनुराधा ने एकांत में बाते की फिर उनलोगों ने विदा ली, विदा लेते समय आदित्य की माँ ने अनुराधा की माँ को,अनुराधा से बात करने को बोला तो उन्होंने गले लगा लिया । उनलोगो के जाने के बाद अनुराधा की माँ ने मुझे उससे बात करने का आग्रह किया तो मैंने निश्चिंत रहने को कहा । 

राजेश बाबू ने बताना शुरू किया सुशील बाबू कुछ दिन पहले मेरे बीमार होने पर मिलने आये थे उसी समय मैंने उनसे कहा था ससुराल में कोई इसकी फ़िक्र करने वाला नहीं हैं मुझसे लगने लगा है इसीलिए फियदि कोई लड़का मेरी अनुराधा से विवाह करने वाला हो तो बताना । २-३ हफ्ते पहले उन्होंने बात की और अनुराधा का फोटो भिजवाने को बोला, कुछ दिन बाद उन्होंने अनुराधा को अपने घर की बहु बनाने की बात बोली तो मैं दंग रह गया क्योंकि कोई बाप अपने कुँवारे नौजवान बेटे की शादी एक ऐसी लड़की से नहीं करना चाहता है जो विधवा होने के संग उससे उम्र में २-३ साल बड़ी भी हो । लेकिन लगता हैं अनुराधा के कोमल मन और विधाता द्वारा उस पर किये वज्रपात ने सुशील बाबू और उनके परिवार के ह्रदय को स्पंदित कर दिया हो नहीं तो कौन ऐसा करेगा हमारे समाज में ।

ऐसे समाज में जहाँ विधवा होना ही अपने आप में अभिशाप समझा जाता हो उससे विवाह करने के लिए अच्छे व्यक्ति का आगे आना मेरे लिए सुखद आश्चर्य था । मैंने उस समय सब से विदा ली ।

दूसरे दिन मैंने अनुराधा को शाम को मंदिर चलने को कहा तो वह चलने को राजी हो गई। शाम को तय समय पर वह तैयार होकर आ गयी हम लोग मंदिर के लिए निकल पड़े । पूजा-अर्चना के बाद हम दोनों ने एकांत ढूंढी कुछ देर इधर-उधर की बाते की फिर मैंने आदित्य की बात छेड़ दी वह मौन हो गई ।

मैंने जब उससे पूछा क्या वह तुम्हे पसंद नहीं तो बोली ऐसी बात नहीं हैं । फिर उसने बोलना शुरू किया मैं एक विधवा ऊपर से एक बच्चे की माँ और वह कुँवारा, समाज उसे जीने नहीं देगी । 

इतना सुनते ही मेरे अंदर की सोई स्रीत्व के भाव जाग उठे, उस भावावेश में मैँ बोल उठी यदि तुम आदित्य से शादी कर लो तो कोई पाप नहीं करोगी । तुम्हे भी अपनी जिंदगी सम्मानजनक रूप से जीने का पूरा हक़ हैं,ये भी नहीं है कि वह सिर्फ तुम्हे अपनाना चाहता हैं, वह तो तुम्हे और तुम्हारी बेटी को भी अपनाने को तैयार हैं क्या कोई इतनी इज्जत और प्यार करने वाला ढूँढ़ने से भी मिलेगा तुम्हे? तुम उस समाज की बात कर रही हो जो पुरुषों के लिए अलग नियम बनता है और स्त्रियों के लिए अलग । उस समय समाज की आँखे क्यों फिर जाती है, जब एक पुरुष अपने पत्नी के चिता के शांत होने से पहले अपनी बेटी के उम्र की लड़की से विवाह कर लेता हैं अपनी हवस की आग में ।

उसने सर हिला दिया, तो मैंने कहा आदित्य से मिल लो और अपनी माँग आदित्य के नाम कर दो, मेरी प्यारी बेटी । वह कुछ बोल न सकी बस गले से लिपट कर रोने लगी । 
"अनुराधा...!" मैंने उसे सीने से लगाते हुए कहा ।

चाची आज मुझे रो लेने दो । आज के बाद मेरे भी अच्छे दिन आने वाले हैं । 

सूरज ढलने को था, हम दोनों घर की ओर निकल पड़े, मेरे मन में एक ख़ुशी थी फिर से मेरी अनुराधा की उजड़ी मांग को उसके पिता ने सजाने की जो ठानी थी उसे आदित्य जैसे अच्छे व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति पूरा करने को तैयार था ।


#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला  #मचान 
-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार)
दिनांक- १७/०६/२०१७
Share: