Wednesday, 31 May 2017

आलेख सं : २

शीर्षक : "संवेदनशीलता की गोद में"

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आधुनिक होते हमारे समाज में हम नित नए मित्र, सुख-सुविधाओं और ठाठ-बाट भरी जीवन जीने की चाह में अपने पास के अमूल्य मित्रों, अनुभवों, धरोहरों और सुख-शांति को खोने की ओर अग्रसर प्रतीत होते हैं ऐसा होना तो लाजिमी हैं क्योंकि जब कोई समाज समग्रता को छोड़कर एकलता ओर अग्रसर हो जाये  जैसे- मेरा घर, मेरा खेत और मेरा मित्र इत्यादि  

समाज का अंग्रेजी शब्द सोसाइटी लैटिन भाषा के सॅाशियस से निकला हैं, जिसका अर्थ कॉमरेड, दोस्त और बंधु होता हैं यानी कि ऐसा समूह जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे की विकट परिस्थितियों में सहायता करने को आगे आते हुए अपने सहभागिता से समाज की बगिया को स्पंदित करता हों

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जैसे-जैसे मानवजाति ने आधुनिकता को अपने मन के आवरण पर द्वेष, ईर्ष्या और दंभ को पैर पसारने का अवसर देना शुरू किया तो हमारा मन द्वारा समाज के कोमल भाव को समझने से ज्यादे समाज में व्याप्त विकट व्यव्हार को ह्रदय से लगाना बेहतर समझा  भाग-दौर से भरी इस जिंदगी में हम सरसता से कोसो दूर होते जा रहे सरसता में ही समभाव अपनी पैठ को पल्लवित कर पाता हैं क्योंकि अपनी प्रसन्नता सब के साथ बाँट कर उसे दुगुना कर सकता है

आज जब हम मंगल, चन्द्रमा और अन्य ग्रह पर पहुंचने की बात कर रहे हैं तो शायद अपनी आत्मा से कोसों दूर जाने की राह को आत्मसात करने की ओर बढ़ चले हैं हमारा मन शायद मढ़ित आभा की ओर आसानी से आकृष्ट हो जाता है, जो हमें असंवेदनशील के पक्ष में ले जाने के लिए काफी हैं

शायद हम इतने कमजोर हो गए है कि अपने मन पर संतुष्टि की आभा को उद्वेलित नहीं कर सकते और जब तक संतुष्टि की आभा नहीं जगमगायेगी तब तक हमारा मन संवेदनशीलता को अपने आस-पास भी नहीं भटकने देगा जबकि संवेदनशीलता हमे आत्मबल, चरित्रवान, दयालु, कर्मठ, पथप्रदर्शक और सामाजिक इत्यादि बनाती बनाती हैं लेकिन इसके बावजूद हम इससे भागते हैं क्योंकि हम कृतिम आनंद में रहकर ही खुश हो जाना पसंद करते हैं

आज भारत में ऐसा दौड़ चल पड़ा हैं कि तनाव को दूर करने के लिए फूहड़, द्विअर्थी या किसी एक समूह (लिंग, क्षेत्र और धर्म इत्यादि ) को लक्ष्य करके लोगों के मन को कुछ पल के लिए ही सही सुकून मिल जाता हैं लेकिन ये कुछ पल के लिए ही होता हैं

कुछ पल की प्रसन्नता दिमाग को सुकून तो दे सकता हैं मगर आत्मा की प्रसन्नता "मन और दिमाग" दोनों को  हर समय एक अलग अनुभूति की प्राप्ति होती हैं समाज को संकुचित का छोड़ वृहत मानसिकता को आत्मसात करने की जरुरत हैं आधुनिक संचार के इस युग में व्हाट्सप और फेसबुक जैसे सोशल साइट पर तो हम बहुत संवेदनशील दिखते हैं मगर समाज के गंभीर मुद्दे पर समाज में अपनी बात रखने से कतराते हैं इस कमी को जितनी जल्दी समाज के द्वारा दूर कर लिया जाये समाज उतनी ही जल्दी संक्रमण से निकल जायेगा

समाज को सामाजिक विद्वान् टैरी के शब्दों को याद रखने की जरुरत हैं "जैसे की दूसरों को ज्ञान बाँटते समय, दूसरों को ज्ञान भी मिल जाता हैं तथा बाँटने वाले के पास भी ज्ञान रहता हैं " इस बात को आत्मसात करते हुए समाज को आगे बढ़ने की जरुरत हैं

#HINDI #ARTICLE

#मिथिला #बैसार

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राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला ), बिहार। 
दिनांक- ३१/०५ /२०१७
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