Saturday, 22 April 2017

"हाय"

लघु कथा सं१२ 
शीर्षक-"हाय"~~~
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हाय !
क्या आप मुझे जानते हो ?

शाम को सो कर उठने के बाद जैसे ही मैंने अपना मोबाइल देखा तो चाचा जी के नंबर से एक मैसेज पा कर मै हैरान तो हुआ ही थोड़ा परेशान भी हुआ क्योंकि चाचा के मोबाइल नंबर से ये आज पूछ रहा हैं कि "क्या मै उसे जानता हूँ?" जबकि मैं उस नंबर पर कई महीनों से मैसेज कर रहा था । मुझे चाचा की ये बात बुरी लगी गुस्सा कर मैंने उनको मैसेज भेजना बंद कर दिया ।

उस दिन के बाद मैंने उनको ना मैसेज किया ना ही कोई कॉल, लेकिन दो-तीन हफ्तें बाद उनके नंबर से एक मैसेज आया "क्या हुआ उस दिन के बाद कोई मैसेज नहीं?" प्रति उत्तर में दिमाग कह रहा था जबाब ना दों लेकिन शायद दिमाग की बातों को हाथों ने दिल का साथ देना पसंद किया और मैंने टाइप किया यदि आप मेरे प्यारे चाचा जी नहीं हैं तो फिर किसी अनजाने को मैसेज भेज कर परेशान करना उचित नहीं समझता ।

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तत्क्षण उधर से एक दार्शनिक मैसेज आया "आप उस इंसान के लिए अनजाने नहीं होते हैं जिसे आपके आने का इन्तजार हो, आपके मैसेज को लेकर मेरा भी यही सोच हैं ।" मैंने उनकी बातों में हाभी भरी साथ ही अपनी बात भी कहीं लेकिन अनजानों को अपना समझना सही बात नहीं । उधर से उनका फिर मैसेज आया क्यों ना हम दोनों एक-दूसरे से अपने बारे में बातें साझा करना चाहिए। अब मेरे चौंकने की बारी थी क्योकि मैं तो समझ रहा था चाचाजी मजाक कर रहे हैं मुझे चिढ़ाने के लिए तब भी मैंने कहा चाचाजी आपके बारे में तो मुझे पता हैं ही ।

उधर से मैसेज आया 'मैं आपकी' चाचा नहीं ने मुझे फिर चौंका दिया, तो मैंने कहा चाचीजी होंगी "नमस्ते चाची"। तो उसने फिर उत्तर दिया ना ही मैं आपकी चाची हूँ ना ही चाचा, मैं तो एक लड़की हूँ जो कि आपके प्यारे-प्यारे मैसेज पढ़कर आपकी फैन बन बैठी जिसके कारण आज अचानक सोचा क्यों ना उस प्यारे इंसान से ये पूछ लिया जाये वो हैं कौन ।

यह सिम लिए हुए मुझे मुश्किल से छः हफ्तें हुए हैं, तो मुझे लगा शायद अगला इंसान सही बोल रहा हो । उसने लिखा वो मुंबई से हैं और दिल्ली में कुल जमा डेढ़ महीने हुए हैं, मैंने कहा ठीक हैं मैं आपसे फिर बात करता हूँ क्योंकि मुझे मार्किट से सब्जी लानी थी ।

रात को मैंने दोस्ती के नाम एक मैसेज टाइप किया और उसे भेज दिया, मैसेज का जवाब ना आने से मन में हल चल मची थी बार-बार मोबाइल की स्क्रीन पर नजर थी मगर कमबख्त मैसेज नहीं आया उसी इंतजार में मैं कब सो गया पता ही नहीं चला ।

सुबह उठा तो उसका मैसेज मिला लेट रिप्लाई के लिए क्षमा माँगा, साथ ही उसने अपना नाम अवनि बताया, अब अवनि में मेरी उत्सुकता चरमता को छूने को बढ़ चुकी थी ।
अवनि  : आपका नाम?
मैं : नीलेश ।
अवनि : आप कहाँ रहते हो?
मैं : लखनऊ।
अवनि  : क्या करते हो?
मैं : एम.बी.ए (फाइनल ईयर)
अवनि : कितनी दूर है लखनऊ दिल्ली से?
मैं : १२ घंटे
अवनि : क्या हम लोग परसों मिले दिल्ली में?
मैं : इतनी जल्दी क्या हैं?
अवनि : मेरा जन्मदिन भी हैं, अनजाने शहर में किसी अनजाने अपने के साथ अपना बर्थडे सेलिब्रेट करु इससे अच्छी बात और क्या हो सकती हैं मेरे लिए ।
मैं : आधे घंटे में सोच कर बताता हूँ कहकर मैंने विदा ली ।

रात को मैंने मैसेज किया मैं कल आ रहा हूँआपसे मिलने, उसने कहा स्वागत हैं । दिल्ली पहुँचकर मैंने मैसेज किया मैं आ गया कल मिलते है राजीव चौक पर तो उसने हामी भर दी। सुबह जन्मदिन की शुभकामना मैसेज करके मैं जल्दी-जल्दी मैं तैयार हुआ और उससे मिलने को निकल पड़ा । रास्ते भर उससे कैसे बात करूँगा, वो कैसी होंगी यही सोचता रहा, इसी बीच उसका कॉल आया, कैसे बात करू इसी को लेकर पसोपेस में था कि दुबारा  रिंग बज उठी ।  मैंने कॉल रिसीव की उधर से प्यारी सी आवाज़ आयी नीलेश मैं बेसब्री से राजीव चौक पर इंतजार कर रही हूँ तुम कहाँ हो, मैंने कहा बस राजीव चौक गया । पहुँचते ही मैंने कॉल लगाई तो कुछ दूर पर एक सुन्दर मुखरे को मुझे ढूँढ़ते पाया । नजदीक पहुँचकर मैंने अपने मोबाइल सेट पर कहा हाय अवनि, सामने खड़ी लड़की ने कहा वॉव नीलेश ।

हम लोग चांदनी चौक पहुँचे वहा से गुरु-द्वारे, वहा माथा टेका फिर हम लोग परिसर में बाते करने लगे कब दोपहर हो गई पता ना  चला । अवनि ने कहा कोर्स कम्पलीट कर लो अपनी ही कंपनी में जॉब लगवा दूँगी टेंशन मत लेना । बहुत सारी बातें हुई मगर आज के लिए कम ही थी, उपहार और शुभकामनाएँ देकर मैं लखनऊ के लिए निकल पड़ा इस वादे के साथ  कि फिर मिलेंगें हम ।

बातों का दौर जारी था मैं अवनि की दुनिया में इतना मशगूल था छ: महीने कैसे बीत गए पता ही ना चला, उसने अपनी ही कंपनी में मेरी जॉब लगवा दी । मेरे नौकरी को एक साल होते-होते हम दोनों ने अपने को एक बंधन में बांधने की सोच, इसी बीच मेरी पोस्टिंग पुणे हो गई मै चला गया और दुरी बढ़ने लगी नौबत ये आ गई की उसको मेरे मैसेज या कॉल चिढ़ दिलाते ।

एक शाम उसका कॉल आया अब से कॉल या मैसेज मत करना अगले महीने मेरी शादी हैं मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ मैंने कहा आखिरी बार मिल तो लो, इस बार वो मिलने आयी पुणे। खूब रोया उसने लेकिन मैं तो रो भी ना पाया, रात को खूब सारी बाते की हम दोनों ने । सुबह उसने दिल्ली की फ्लाइट ली और जाते-जाते बोल गई तुम्हें ना  भूल पायेंगे, अलविदा ।

रास्ते भर यही सोचता रहा जिसे हम जिंदगी में जिसको अपना सब कुछ मान बैठते हैं उसका हमे अकेला छोड़ जाना मौत से भी बतर जिंदगी दे जाने जैसा हैं।  शायद यही जिंदगी अवनि ने मुझे अपनी यादों का उपहार भेट किया था "लव यू अवनि" ।

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 
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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार)
दिनांक-२२/०४/२०१७
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