Monday, 20 March 2017

"अँधेरा"

लघु कथा सं- ११
शीर्षक-"अँधेरा"~~~
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शाम का समय था, बच्चे बगल के बगीचे में खेल रहे थे। खेलते-खेलते अंधेरे ने अपनी छटा कब बिखेर दी पता ही नहीं मगर बच्चों का जी अब तक ना भरा था। माँ के बुलाने पर घर तो गए मगर उन दोनों को माँ छत पर जाने से रोक नहीं पायी।


छत पर दोनों भाई खेलने लगे, खेलते-खेलते कब घने अंधेरे ने अपना आशियाना बना लिया पता ही नहीं चला। दोनों अंधियारे का मजा तो ले रहे थे लेकिन अंधियारे ने उनके आनंदित मन में खलल डालना शुरू कर किया, अब वो दोनों एक-दूसरे को ठीक से देख भी नहीं पा रहे थे।

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लेकिन रविवार होने के कारण दोनों आज के दिन का लुफ्त उठा लेने को लालायित थे, क्योंकि आज के बाद फिर अगले रविवार को ही उनको ये अवसर मिल पायेगा। इसी बीच पता नहीं बड़े भाई को क्या सूझी वो घर से टॉर्च ले आया और अपने भाई के चेहरे पर रौशनी प्रसारित कर के अपने को खुश कर रहा था इधर छोटे भाई के आँखों के साथ कोमल मन पर भी वेदना साफ़ झलक रही थी।

कुछ देर तक तो किसी तरह उसने अपने वेदनाओं को सहा लेकिन जब उससे सहा नहीं गया तो वो भी घर से टॉर्च ले आया और प्रति उत्तर में रौशनी प्रसारित करने लगा। अब दोनों को दिक्कते हो रही थी, अब फिर से अंधेर वाली स्थिति ही हो गई थी बस कहने को अंधेरे की जगह रौशनी ने ले ली थी। रौशनी होते हुए भी दोनों भाई एक-दूसरे को पहले की तरह ही नहीं देख पा रहे थे।


दोनों भाई बहुत देर तक ऐसा ही करते रहे, लेकिन अचानक ही दोनों भाई झगड़ने लगे। माँ को जब शोरगुल सुनाये पड़ी तो वह दौड़ी-दौड़ी उन दोनों के पास पहुँची।

माँ ने पहुँचते ही दोनों से झगड़ने का कारण पूछा तो दोनों एक दूसरे पर प्रसारित रौशनी की बात बोलने लगे। कुछ देर चुप रहने के बाद माँ ने समझाने की मुद्रा में आते हुए कहा जीवन के किसी मोड़ पर यदि अंधियारे से मिलान हो जाये तो इसका मतलब ये नहीं कि खुद के जीवन में उजाला की चमक बिखेरने के लिए दूसरों के संग क्रूरता का व्यवहार करें। जीवन में कठिन परिस्थिति में विनम्रता एवम सहस से ही विजय पाई जा सकती हैं ना की एक-दूसरे को दिग्भ्रमित करके।

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आज यदि मानव अपने ज्ञान को विनम्रता रुपी रौशनी प्रज्वलित रखते हुए खुद भी आगे बढे और दूसरो को आगे बढ़ाने में सहायता करे तो मन आनंदित रहे। लेकिन आज के दौर में अहंकार को ज्ञान का रूप मानकर एक-दूसरे को अपने अहंकार रुपी आभा से दूसरे की लौ कम करने में लग जाते है। जब की होना ये चाहिए कि अपने-अपने आत्मा के अंदर प्रस्फुटित प्रकाश की दमक को विनम्रता के मार्ग पर चलते हुए खुद भी आनंदमय जीवन जिए और दूसरे को विनम्र जीवन जीने को प्रेरित करे।
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#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार)
दिनांक-२०/०३/२०१७ 
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