Friday, 17 February 2017

आलेख सं : १

शीर्षक : "भावनाओं को खिलने दो, प्रेम खुद महकेगा"

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आज का भारतीय जनमानस जब प्रेम की बात करता हैं तो अपने आपको एक कसमकस में पाता हैं, जिसमें उसकी लड़ाई में खुद का नायक भी हैं और खुद का खलनायक भी। भारतीय संस्कृति में प्रेम शब्द का खास स्थान रहा हैं जिसमें हमारी भावनाओं का बहुत महत्वपूर्ण किरदार रहा हैं, लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में भावना का प्रभाव तेजी से कम हो रहा हैं शायद इसकी जगह चिकनी चुपड़ी बातों ने ले लिया हैं तभी तो किसी से दूर हो जाने के लिए उसे सही बातें नहीं बोल पातें।

भावनायें, जीवन के मूल्यों को उच्च स्तर पर बनायें रखने हेतु आदिकाल से ही हमारे समाज के लिए अचूक औषधी रही हैं। समय के साथ भारतीय जनमानस के सोच में आधुनिकता ने अपनी जड़ जमा ली हैं, अब भावनाओं पर आडंबर का जलवा हैं। अब आपके विचारों से ज्यादा आपके कपड़े को देखकर आपके रसूख का लोग पता लगाने की कोशिश करते हैं, तभी तो आज का प्रेम जिस गति से होता उसी गति को अपना गला भी घोंट लेता हैं। आज का प्रेम व्यक्तित्व ना हो कर देह रूपी सौंदर्यता से हो चला हैं, जिसका नैतिकता के आधार पर तेजी से पतन भी हुआ हैं ।

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टाइटैनिक फिल्म के एक दृश्य में हेरोइन को उसका मंगेतर अपनी बंदिश में बांधने को आतुर रहता हैं जिसके बंधन में हेरोइन अपने आपको बंधन मुक्त करने को बेताब हो जाती हैं। उसी जहाज पर उन्मुक्त होने के लिए उसका लगाव एक चोर के इल्जाम में पकड़े गये लड़के से हो जाता हैं जो उसे जीवन को उन्मुक्ता से जीने की कला सिखाता हैं। भावनाओं को बंधन से मुक्त रख कर ही आप किसी के दिल पर राज कर सकते हैं, क्योंकि दिल पर उसी का राज हो सकता हैं जो इसको सींचता हो ना की हाथ से मसले। मसलने वाले के हाथ तो बस काँच का टुकड़ा लगता हैं जो उसके हाथों को रक्त-रंजीत के सिवाय कुछ नहीं दे जाता।

सतयुग में पिता-पुत्र का प्रेम "भगवान राम के विछोह में पिता का प्राण त्याग देना" उनके बीच का निश्छल प्रेम को प्रमाणित'करता हैं, इसी काल में माँ सीता और प्रभु राम के दिल के तार उनके साथ न होते हुए भी जुड़े थे ये बंधन तो भावनाओं का ही बहाव को दर्शाता हैं। उस समय का प्रेम शायद भावनाओं के कोहिनूर से जड़ित था, जो समय के साथ अपनी चमक खोता गया। वह प्रेम जीवन का आत्मलोकन था या फिर जीवन को जीने की एक कला।

जैसे-जैसे भारतीय समाज ने अपने आपको आधुनिकता की ओर अग्रसर हुआ, उसके जीवन से भावनाओं का जुड़ाव भी कम होता गया या ये कहे कि मरणासन्न हो चला हैं। प्रेम रुपी बंधन को साहित्य और सिनेमा तक में स्री व पुरुष के बीच के भावनाओं को प्रस्फुटित ना दिखा कर उसके दायरे को देह तक सीमित कर दिया, साहित्य और फिल्म को हमारे जीवन के लिए आईना समझा जाता हैं जिसकी नींव आज के दौर में खोखली हो चली हैं।

प्रेम का आरंभिक आधार भाव-भंगिमाओं जड़ित आचार-विचार से हैं जो स्त्री-पुरुष के कोपल मन को छू जाये, विरले ही हैं जिन्हें ये सहज ही एहसास हो जाये। भावनाओं को समझने के लिए सबसे पहले खुद को समझना आना होता हैं, और उसके लिए अपने आपको समय देना होता हैं जो की हमारे पास नहीं हैं। भावनाओं का संचार स्वतंत्र मन में होता हैं, लेकिन आज के दौड़ में विरले ही हैं जिनके मन रुपी व्यक्तिव्य का स्वतंत्र विकास हुआ हो। आदिकाल से प्रेम का पोषण हमारे समाज में भावनाओं ने किया हैं, मगर लगता हैं कि इक्कीसवीं सदी में जनमानस ने दिल के शब्दकोष से बड़ी तेजी से भावना रुपी प्रेम को रसातल पर पहुँचा दिया हैं ।

आज का युवा पहले से समझदार हो गया आज के दौर में वह देवदास नहीं बनता बल्कि अपने लिए नई पारो ढूंढ़ने में लग जाता हैं। अब भावना रुपी प्रेम का स्थान तेज़ी से जरुरत रुपी प्रेम ने युवाओं के बीच बना लिया हैं, तभी तो कल का प्रेम-विच्छेद आज पर हावी नहीं हो पाता जो कि एक तरह से सही भी हैं। लेकिन इसके कारण कहीं ना कही हमारे भावनाओं की नीलामी सौंदर्यता के बाजार में कौरी के भाव हो जाती हैं। जहाँ भावनाओं की बागवानी करने का दंभ तो हर कोई करता हैं मगर उसे हरा-भरा करने का ना हो कर बस रसपान के लिए । 

आज के दौर में प्रेम की जरुरत तो हर कोई महसूस कर रहा हैं मगर दूसरों से साझा करना शायद लोग भूल बैठे हैं तथापि यह जानते हुए कि भावों के आगे तो भगवान भी नतमस्तक हो जाते हैं तो फिर इंसान की क्या बिसात। प्रेम को भी लोगों ने शानो-शौकत से जोड़ दिया हैं अपितु होना ये चाहिए था कि उसका जुड़ाव मन के आँगन से हो जहाँ भावना खिले कि प्रेम खुद गुलजार हों ।

समय अपनी प्रकृति जिस तरह चौबीस घंटे बाद फिर पा जाता हैं, ठीक उसी तरह भावनाओं को भी एक समय बाद अपना रूप मिल जायेगा। इसके लिए जनमानस को भावनाओं को समझने के लिए मन रुपी नयन को निःस्वार्थ भाव से समर्पित करना होगा "जहाँ लेने-देने का भाव न होकर देने का भाव हो", प्रेम खुद अपनी महक बिखेर जायेगा ।

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राम "मैथिल"
दरभंगा(मिथिला ), बिहार। 
दिनांक- १७/०२ /२०१७
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