Monday, 2 January 2017

"दो पुष्प"

लघु कथा सं-१०
शीर्षक-"दो पुष्प"---

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🔵 एक आश्रम में दो मित्र रहते थे । एक बचपन से हर चीज में अच्छाई की खोज में रहता तो दूसरा मित्र हर चीज में बुराई को ढूंढ़ता, यही बात दोनों को एक दूसरे से अलग करती थी । जब इस बात की गुरु जी को पता लगी तो गुरु जी ने कुछ सोचकर दोनों को संध्या पूजन बाद अपने पास बुलाया और वन से सुगन्धित पुष्प लाने को बोले तो दोनों ने कृतघता से स्वीकार कर लिया । साथ ही गुरू जी ने एक निर्देश भी दिया की जिस मार्ग से एक बार गुजर जाये उस मार्ग को पुष्प तोड़ने वापस नहीं लौटना हैं ।

🔴 अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में दोनों मित्रों ने आश्रम से पुष्प-डोली लेकर वन को प्रस्थान किया । सबसे पहले दोनों ने वन में प्रवेश करने के कुछ देर बाद ही नन्हें पौधें को देखा, जैसे ही दोनों नजदीक पहुँचे पहले वाले ने झट से उस पौधें से कुछ पुष्प तोड़ लिये वही दूसरी ओर दूसरे वाले ने कहकर छोड़ दिया की यह पुष्प उतना सुगन्धित नहीं हैं जितना की गुरु जी ने कहा हैं ।

🔵 धीरे-धीरे दोनों आगे बढ़ते गये,पहले वाले यदि कोई पुष्प थोड़ा सा भी सुन्दर लगता तो वह डाल से पुष्प का गुच्छा तोड़ लेता लेकिन वही उसका मित्र उस पुष्प से ज्यादा सुगन्धित पुष्प की चाह में उसे छोड़ देता । समय बितता जा रहा था, समय के साथ पहले वाले मित्र की पुष्प-डोली रंग-बिरंगे सुगन्धित पुष्पों से भरती जा रही थी और उधर उसके मित्र की पुष्प-डोली में पुष्प के नाम पर दो-चार पुष्प थे ।

🔴 पूजा के शुरू होने से पहले उन दोनों को पहुँचना भी था, समय अपनी गति से चल रहा था पहला मित्र समय के गति के साथ अपने काम को अंजाम दे रहा था ये देखकर दूसरे मित्र की घबराहट बढ़ गई और इस कारण वह सुगन्धित एवं असुगन्धित पुष्पों में कोई अंतर ही नहीं महसूस कर पा रहा था ।
#नव_वर्ष_की_हार्दिक_बधाई

🔵  कम समय होने के कारण वो बिना सोचें-समझे पुष्पों को पुष्प-डोली में रखे जा रहा था । चलने का समय हो चुका, अब थोड़ी भी देरी प्रातःकालीन पूजा में सम्मलित ना होने का कारण बन सकती थी । पहला मित्र संतुष्ट था, मगर दूसरा अपने आप से गुस्सा था । मगर उसके पास करने को कुछ नहीं बचा था, भारी मन से वो अपने मित्र संग आश्रम के लिए विदा हुआ ।

🔴 आश्रम पहुँच कर, दोनों ने गुरु जी के दर्शन किये एवं अपने-अपने पुष्प-डोली गुरु जी को समर्पित कर दिया । गुरु जी ने दोनों को अपने पास संध्या की पूजा बाद आने को बोला । पूजा के बाद दोनों गुरू जी के पास आये, गुरू जी ने दूसरें शिष्य से सफल ना होने का कारण पूछा तो वो जंगल में दोष निकालने लगा उसे सुनने के बाद गुरू जी ने कहा कोई मनुष्य उसी स्थल से उतने ही संसाधन मे अपने बुद्धि और विवेक का उपयोग कर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता हैं और कुछ बस समय का बुद्धि पूर्वक उपयोग ना कर अपने लक्ष्य को दिशाहीन कर लेते हैं ।

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समय रहते सही-गलत का सही निर्णय हमें सफलता की ओर अग्रसर करता हैं वहीं बिना सोचे-समझे लिया निर्णय हमारा समय तो नष्ट करता ही हैं संग ही हमें अपने लक्ष्य से भी दूर करती हैं । समय के साथ समय पर कदमताल ना मिलाना अंत में हमें हरबराहट का मार्ग चुनने को मजबूर करता हैं और इसी चक्कर में अंजाने में ही हम अपने असफलता के साथी बन बैठते हैं ।
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#HINDI #MOTIVATIONAL #STORY

#मिथिला #मचान

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राम "मैथिल" ।
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-०१ /०१/२०१७
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