Tuesday, 15 August 2017

आलेख सं- ५

शीर्षक : "स्वतंत्र, परतंत्र और कर्तव्य"
-----------------------------------------------------------------------------------------------

हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजर बंद न गा पाएँगे,
कनक तीलियों से टकरा कर, पुलकित पंख टूट जाएँगे ।
                                               --- माखनलाल चतुर्वेदी

स्वतंत्र : बाहरी तत्व से परे स्वयं के मन की सुनना व करना,
परतंत्र : आंतरिक तत्व से परे दूसरे की सुनना व करने को बाध्य,
कर्तव्य : मध्य मार्ग (जिसमें स्वतंत्रता एवम् परतंत्रता का समन्वय हो अर्थात् जिस समय स्वयं की स्वतंत्रता को भूल हम दूसरे की स्वतंत्रता का ख्याल रखते हुए संविधान या समाजिक कटिबद्धता को अपनी तृष्णा की आहूति दे रहे होते हैं); कहा भी गया हैं अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाला कभी आपसे पाने का भाव नहीं रखता क्योंकि उसने देने के भाव को पाने 
की चाह से कहीं ऊपर उठा लिया होता हैं । 

Like Us @ www.facebook.com/kahaninaama

अपनी स्वतंत्रता की चिंता में जाने-अनजाने ही सही, कहीं हम दूसरे को स्वतंत्रता का हनन तो नही कर रहे होते हैं ?

भारतीय समाज की पुरातन काल से विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान रही हैं चाहे वह समाजिक व्यवस्था हो या फिर राजव्यवस्था, सदैव से जनमानस की भावनाओं के प्रति आदर का भाव रखा हैं । भारतीय दर्शन समभाव अर्थात् हर जीव, हर पंथ, हर समाज, हर वर्ग और हर लिंग( स्त्री-पुरुष) आदि को समान दृष्टि भाव देना । यह सब हमे अपने सभ्यता पर गर्व करने का महान अवसर देता हैं यह सब ऐसे ही नहीं हो गया इसके लिए हमारे महान आत्माओं (पूर्वजों) ने स्वयं की स्वतंत्रता से अधिक दूसरों की स्वतंत्रता को तरजीह दी । महान देश की परंपराओं को पवित्र बनाये रखने के लिए देश के समस्त नागरिक अपने स्वतंत्रता से अधिक अपने कर्तव्य पर ध्यान देना होगा तभी देश की महान परंपरा जीवंत रह पाएँगी अन्यथा देश स्वतंत्र होकर भी परतंत्रता की बेड़ी (संप्रदायिकता, आतंकवाद, जातिवाद, अशिक्षा, मनोविकार, स्त्री-पुरुष असमानता, भ्रष्टाचार इत्यादि) में जकड़ी रहेगी ।

समाज में सुखद परिवर्तन के लिए समाज को जिम्मेदारी लेनी ही होगी । आज के समय में कितना ही क्यों न सरकारी तंत्र परिवर्तन करना चाहे लेकिन बिना समाज के पूर्ण सहयोग के किसी समस्या को दूर नहीं की जा सकती इसका उदाहरण स्त्री-पुरुष समानता की दशा से समझी जा सकती हैं (समाज स्वयं की सोच में उस गति से बदलाव नहीं ला पाया जिस गति में उसने अपनी जनसंख्या बढ़ायी हैं), जिसके लिए समान रूप से स्त्री-पुरुष दोनों जिम्मेवार हैं ।

#स्वतंत्रता_दिवस_की_समस्त_मित्रों_को_हार्दिक_बधाई

भारत को विकास के राह पर ले जाने के लिए हर भारतीय को समझना होगा कि हम भारतीयों को आधुनिक एवं पुरातन के सम्मिश्रण को आत्मसात करने की आवश्यकता समीचीन मालूम पड़ता हैं 

विकास की गति में हम संस्कृति के साथ चल सकते हैं मगर सभ्यता पीछे छोड़ना पड़ता हैं । सभ्यता माता-पिता या पूर्वज समान (जो हमारे साथ रहना चाहते हैं) और संस्कृति पुत्र- पुत्री समान (जिनके संग हम रहना चाहते हैं) । लेकिन भारतीय समाज यह निर्धारित नहीं कर पा रहा कि उसे किसके साथ रहना चाहिए क्योंकि दोनों के साथ संतुलन बनाये रखना थोड़ा कठिन हैं लेकिन असंभव नहीं । दोनों के साथ यदि समाज ने संतुलन बना लिया जाए तो भारत को विकसित राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता ।

भारतीय समाज जिस गति से विकास की ओर अग्रसर हैं उसी गति को बनाये रखने के लिए सभी को एक रहना होगा तभी भारतीयता जीवंत रह पाएँगी ।

2-4 दशक भारतीय समाज के कठिन दौर से गुजरने वाला होने वाले हैं । यदि इस काल खंड में भारतीय समाज ने अपनी परिस्थिति स्थिर रख ली तो फिर समाज विश्व का पथ प्रदर्शक होगा अन्यथा ईश्वर मालिक ।

अंत में एक बात कहना चाहूँगा आज के ही दिन सत्तर वर्षों पहले भारत तो स्वतंत्र हो गया था मगर इन सत्तर वर्षों में भारतीयता परतंत्र हो गई - लोभ, धन, ईर्ष्या, दम्भ, यौन कुंठा, ओछी राजनीति, भ्रष्टाचार और विश्वाघात इत्यादि । 

अब समय गया हैं कि हम परतंत्रता की बेड़ी का स्वतंत्रता से आलिंगन करवाए । समाज में इस सुखद परिवर्तन के लिए समाज को अपनी जिम्मेवारी को समझनी ही होगी । #वंदे_मातरम्

#HINDI #ARTICLE

#मिथिला #बैसार

-----------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला) बिहार 
दिनांक- १५/०८/२०१७ 
Share:

Wednesday, 9 August 2017

आलेख सं : ४

शीर्षक : "जीवन का म........र्म"
----------------------------------------------------------------------------------------------

समाज में प्रतिष्ठा नामक शब्द का ऐसा रूप प्रस्तुत किया गया कि मनुष्य अपने दिल की कम और दिमाग की ज्यादा सुनता हैं । समाज के ही कुछ कथित समाजसेवी ठेकेदारों ने प्रतिष्ठा को शान रुपी आडंबर में इस तरह से घुला दिया हैं कि दोनों में अंतर करना मुश्किल प्रतीत होता हैं ।

इस आडंबर ने समाज को अपने भुजाओं में ऐसे  जकड़ लिया हैं कि समाज की पूरी की पूरी जन-समूह  प्रतिष्ठा पाने की चाह में कड़वाहटों को अपने जीवन में घोलने से भी परहेज नहीं करती । प्रतिष्ठा के आँचल को समाज ने इस तरह से उपयोग किया हैं जिससे समाज की संरचना पर ही बुरा असर पड़ने की प्रबल सम्भावना हैं ।

Like Us @ www.facebook.com/kahaninaama

प्रतिष्ठा कुछ और नहीं बल्कि प्रेम का ही एक पवित्र स्वरूप हैं, लेकिन इसके मर्म को समझने के लिए सरलता पहली शर्त हैं । समाज का ताना-बाना प्रेम के डोर से ही बंधी हैं, मानव को उसके दो रूपों में से एक समय पर एक रूप को चुनना होता हैं - ज्ञान का उजाला या अज्ञान का अंधियारा ।

ज्ञान, संवेदनाओ के छत्रछाया में अपने पौध रूप  को वटवृक्ष में विकसित करने में सक्षम हो पाती हैं वही अज्ञान कोरी संवेदनाओ के साए में डर, भ्रम और अविश्वास को अपने साथ जीने को विवश होती हैं ।

ज्ञान जीवन की वह लहर हैं जो स्वयं के आने से पहले मनुष्य को सरलता, विवेकशीलता, सहिष्णुता, प्रेम आदि से सीधा साक्षात्कार करवाता हैं जबकि अज्ञान वह किनारा हैं जो अपने में घमंड, असहिष्णुता, क्रोध, लोभ इत्यादि को आश्रय देता हैं ।

आदिकाल में मनुष्य के प्रतिष्ठा का अनुमान पशुधन की संख्या से निर्धारित की जाती थी, समय के साथ उसका स्थान स्वर्ण मुद्राओं ने ले लिया । आज के आधुनिक कल में प्रतिष्ठा का निर्धारण लक्ज़री गाड़िया, वैभवशाली भवनों इत्यादि ने ले लिया हैं जिसमें सरलता का कोई योगदान नहीं ।

लेकिन सरलता के बिना जीवन आनंदायी भी नहीं हो सकता । मानव जब तक तृष्णा को संतोष की बूँदो से तृप्त नहीं कर लेता तब तक जीवन उसके खुशियों पर अपनी चाबुक ऐसे ही चलाता रहेगा ।

मानव के लिए दैनिक जीवन में हँसते रहना बहुत ही सरल हैं मगर सरल बने रहना उतना ही कठिन । स्थितियां मनुष्य को कठिन या जिद्दी बनाती हैं जिसके कारण वह स्वयं के दिल की नहीं सुनता । लेकिन साहस ही वह उत्प्रेरक हैं जो मनुष्य को सरलता की ओर बार-बार आकर्षित करता हैं जैसे समुद्र की लहरे बार-बार किनारों को पास आकर अपनी ओर आकृष्ट करती हैं  ।

कोमल मन ने यह मनुष्य पर छोड़ दिया हैं कि वह प्रेम के किस रूप को अपने जीवन में लाना चाहता हैं, यदि ज्ञान को अपने जीवन में साथ लाये तो सरलता स्वयं आएंगी और यदि अज्ञान को आश्रय देना जारी रखेगी तो कठिनता अपना पैर जरूर पसारेगी ।

#HINDI #ARTICLE

#मिथिला #बैसार

-----------------------------------------------------------------------------------------------


राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला), बिहार
दिनांक०९/०८/२०१७

Share:

Monday, 3 July 2017

आलेख सं : ३

शीर्षक : "प्रेम में...."
-------------------------------------------------------------------------------------------------

ईश्वरीय शक्ति द्वारा जब कभी सृष्टि की रचना की गई होंगी सर्वप्रथम प्रेम का संचरण उसी बेला में संभवतः हुआ होगा क्योकि हम इंसान उसी ईश्वरीय शक्ति के ही तो पुत्र-पुत्री हैं । किसी भी वस्तु के सृजन से पहले मनुष्य के मस्तिष्क में उस वस्तु की रचना का विचार आता हैं फिर अपने द्वारा की गए कल्पना के माध्यम से काल्पनिक रचना को मूर्त रूप देने का भाव आता हैं और तत्क्षण ही मनुष्य के मन में आकर्षण जन्म लेता है और यही आकर्षण लगाव और लगाव कब किसी वस्तु के प्रति प्रेम में बदल जाता हैं पता ही नहीं चलता, ठीक ऐसे ही विचार हमारे मन में किसी को प्रेम करने से पहले आता हैं। 

प्रेम उस विधा की जननी हैं जिसे अपने नैनिहाल से पाने से पहले स्वयं नैनिहाल से प्रेम करना पड़ता हैं जो निरन्तर चलता रहना चाहिए अर्थात प्रेम ऐसी विधा हैं जिसमे दुसरों को सीखाने से पहले स्वयं भी निरन्तर सीखने का अभ्यस्त होना पड़ता हैं । जैसे एक शिक्षक अपने छात्रों को कोई पाठ पाठन करवाने से पहले स्वयं उसको अछि तरह जनता हो और पाठन कराने के क्रम में उस विषय के गूढ़ रहस्यो को बड़ी सहजता से स्वयं भी समझ ले और अपने छात्रों को भी लाभान्वित कर पाए ।

Like Us @ www.facebook.com/kahaninaama

प्रेम शब्द ही प्रकार्यवाद (Functionalism) की प्रक्रिया हैं क्योंकि हृदय में किसी के लिए प्रेम का बीज बोने मात्रा से आत्मा में उमगता का संचरण कुलाचे मारने लगता हैं । प्रेम में होना सीखने की प्रक्रिया है इसमें कोई दोराय नहीं, जब हम प्रेम में होते हैं तो अपनी हर गलत आदत को छोड़ने को तैयार नजर आते हैं और जिन चीजों से हम प्रेम के पास खड़े हो पाए उसे अपने में आत्मसात करने को प्रयासरत होते हैं अर्थात सिखने को अग्रसर रहते हैं ।

प्रेम मनुष्य को सरल, मृदुलभाषी, सत्यनिष्ठ  करुणामयी आदि जैसे भावो से ओत-प्रोत कर देता हैं, यह सब एक दिन में यह सब सहजता से नहीं सीखा जा सकता हैं, उसके लिए वर्षो तक पौधे रुपी शिशु को उसके माँ-बाप और समाज द्वारा सिचा जाता हैं । किसी दुष्ट द्वारा इसे दो-चार दिन में सीखा भी नहीं जा सकता क्योकि सरलता को जीना बड़ा कठिन कार्य हैं ।

सरलता को आत्मसात करने के लिए सबसे पहले हमे त्याग, संवेदनशीलता, निश्छलता, करुणा इत्यादि के मर्म को समझना अत्यावश्यक हैं, क्योंकि जीवन को सफल बनाने के लिए हमे असंवेदनशीलता से संवेदनशीलता की ओर बढ़ना पड़ता हैं और संवेदनशील होने के लिए करुणा के करीब जाना पड़ता हैं और करुणा प्रेम की छत्र-छाया में पल्लवित होती हैं । यहाँ जीवन के सफल का तात्पर्य सुख-शांति और प्रसन्नचित आत्मा से हैं न की धन-सम्पति से ।

प्रेम का हमारे जीवन में होना मात्रा हमारे मन-मस्तिष्क में नित कुछ नया सीखने की ललक उदीप्त कर देती हैं और यह हमारे बढ़ने की सोच को उड़ने को पंख लगा देता हैं । एक बार इसकी सवारी कर ली फिर तो सीखते ही जाना । सीखने के लिए जरुरी हैं की हम बच्चे की तरह सहजता से अपने मन के कोने में बैठे सरलता को ढूँढने का प्रयास करे ।

जीवन के हर चरण में मनुष्य का प्रेम में होना उसके सफल होने की कहानी बयां करती हैं, इसीलिए प्रेम में अपने जीवन को सरोबार कर के देखिये में सिखने का क्रम जारी रहेगा, लेकिन शर्त बस इतना हैं कि प्रेम को बल मन की तरह निश्छल रहने दें ।

#HINDI #ARTICLE

#मिथिला #बैसार

-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला ), बिहार। 
दिनांक०३/०७ /२०१७
  
Share:

Sunday, 18 June 2017

"फिर से"

लघु कथा सं१३  
शीर्षक-"फिर से"~~~
-------------------------------------------------------------------------------------------------

मैं दालान पर बैठी सूरज की लालिमा को निहार ही रही थी । अनुराधा के दरवाजे के सामने एक कार आकर रुकी जैसे ही उसमे बैठे लोगो को उनको अनुराधा के घर में प्रवेश करते देखा तो एकाएकमुझे ध्यान आया अनुराधा की माँ ने मुझे भी तो किन्ही विशेष लोगो से मिलवाने को बुलाया था । मैं अनुराधा के माँ के उम्र की होते हुए भी उसकी सहेली जैसी थी जिससे वो अपने सुख-दुःख दोनों तरह की बातें बचपन से साझा करती आयी थी, वह मेरी बेटी न होते हुए भी मेरी बेटी थी ।  

मैं फटाफट तैयार हुई और अजनबियों से मिलने के लिए धीर होते हुए भी अधीर हुए जा रही थी, इसी भावावेश में मेरे मन ने अनुराधा के घर की ओर अपने कदमों को गति दे दी । मैंने जैसे ही हॉल में प्रवेश किया  सामने अजनबियों को देखा उत्सुकता से भरे मन अतिथियों को देख रहे थे की राजेश बाबू ने बैठने को आग्रह किया । फिर उन्होंने आये अतिथी से परिचय करवाते हुए कहा ये मेरे बचपन के मित्र सुशील जी, इनकी पत्नी और इनका पुत्र आदित्य जो मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हैं आज विशेष रूप से मिलने आये हैं । 

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

राजेश बाबू ने मुझसे कहा सुशील बाबू अनुराधा को अपने घर की बहु बनाना चाहते हैं, मैं थोड़ी विस्मित थी मगर स्वयं की भावना पर काबू पाते हुए बातें करने में तल्लीन हो गई तभी अचानक अनुराधा को दरवाजे की ओट से आदित्य को निहारते देखा । उसकी हिरणी सी आँखे आदित्य से शायद यही कहना चाहती हो तुम मुझसे क्यों शादी करना चाहते हों, जबकि मै खुद मुरझाई हुई फूल हूँ तुम्हारे बगिया को कैसे महका पाऊँगी । जैसे ही उसकी डब-डबयी आँखों से मेरी आँखे मिली, उसके चेहरे पर और न ही होंठों पर ही कोई हरकत हुई वो रुंधे मन से अन्दर भागी ।

जब मैं उसके पास गई तो देखा बिना किसी भाव के उसके आँसू तकिये में समाये जा रही थी । मेरे पहुंचते ही वो गले से लिपटकर ऐसे रोई कि मैं भी संभल न पायी । किसी तरह उसके आंसुओं ने अपने को संभाला, तो मैंने उसे एक बार आदित्य से मिल लेने को कहा तो बहुत मान-मौनव्ल के बाद वह मान गई । मैंने उसे फटा-फट तैयार हो कर आने को कहा तो उसने अपनी सहमति दे दी ।

कुछ देर बाद जैसे ही उसने दस्तक दी, हॉल में बैठे सब लोग एक टक उसे ही निहारते रह गए । कुछ देर आदित्य और अनुराधा ने एकांत में बाते की फिर उनलोगों ने विदा ली, विदा लेते समय आदित्य की माँ ने अनुराधा की माँ को,अनुराधा से बात करने को बोला तो उन्होंने गले लगा लिया । उनलोगो के जाने के बाद अनुराधा की माँ ने मुझे उससे बात करने का आग्रह किया तो मैंने निश्चिंत रहने को कहा । 

राजेश बाबू ने बताना शुरू किया सुशील बाबू कुछ दिन पहले मेरे बीमार होने पर मिलने आये थे उसी समय मैंने उनसे कहा था ससुराल में कोई इसकी फ़िक्र करने वाला नहीं हैं मुझसे लगने लगा है इसीलिए फियदि कोई लड़का मेरी अनुराधा से विवाह करने वाला हो तो बताना । २-३ हफ्ते पहले उन्होंने बात की और अनुराधा का फोटो भिजवाने को बोला, कुछ दिन बाद उन्होंने अनुराधा को अपने घर की बहु बनाने की बात बोली तो मैं दंग रह गया क्योंकि कोई बाप अपने कुँवारे नौजवान बेटे की शादी एक ऐसी लड़की से नहीं करना चाहता है जो विधवा होने के संग उससे उम्र में २-३ साल बड़ी भी हो । लेकिन लगता हैं अनुराधा के कोमल मन और विधाता द्वारा उस पर किये वज्रपात ने सुशील बाबू और उनके परिवार के ह्रदय को स्पंदित कर दिया हो नहीं तो कौन ऐसा करेगा हमारे समाज में ।

ऐसे समाज में जहाँ विधवा होना ही अपने आप में अभिशाप समझा जाता हो उससे विवाह करने के लिए अच्छे व्यक्ति का आगे आना मेरे लिए सुखद आश्चर्य था । मैंने उस समय सब से विदा ली ।

दूसरे दिन मैंने अनुराधा को शाम को मंदिर चलने को कहा तो वह चलने को राजी हो गई। शाम को तय समय पर वह तैयार होकर आ गयी हम लोग मंदिर के लिए निकल पड़े । पूजा-अर्चना के बाद हम दोनों ने एकांत ढूंढी कुछ देर इधर-उधर की बाते की फिर मैंने आदित्य की बात छेड़ दी वह मौन हो गई ।

मैंने जब उससे पूछा क्या वह तुम्हे पसंद नहीं तो बोली ऐसी बात नहीं हैं । फिर उसने बोलना शुरू किया मैं एक विधवा ऊपर से एक बच्चे की माँ और वह कुँवारा, समाज उसे जीने नहीं देगी । 

इतना सुनते ही मेरे अंदर की सोई स्रीत्व के भाव जाग उठे, उस भावावेश में मैँ बोल उठी यदि तुम आदित्य से शादी कर लो तो कोई पाप नहीं करोगी । तुम्हे भी अपनी जिंदगी सम्मानजनक रूप से जीने का पूरा हक़ हैं,ये भी नहीं है कि वह सिर्फ तुम्हे अपनाना चाहता हैं, वह तो तुम्हे और तुम्हारी बेटी को भी अपनाने को तैयार हैं क्या कोई इतनी इज्जत और प्यार करने वाला ढूँढ़ने से भी मिलेगा तुम्हे? तुम उस समाज की बात कर रही हो जो पुरुषों के लिए अलग नियम बनता है और स्त्रियों के लिए अलग । उस समय समाज की आँखे क्यों फिर जाती है, जब एक पुरुष अपने पत्नी के चिता के शांत होने से पहले अपनी बेटी के उम्र की लड़की से विवाह कर लेता हैं अपनी हवस की आग में ।

उसने सर हिला दिया, तो मैंने कहा आदित्य से मिल लो और अपनी माँग आदित्य के नाम कर दो, मेरी प्यारी बेटी । वह कुछ बोल न सकी बस गले से लिपट कर रोने लगी । 
"अनुराधा...!" मैंने उसे सीने से लगाते हुए कहा ।

चाची आज मुझे रो लेने दो । आज के बाद मेरे भी अच्छे दिन आने वाले हैं । 

सूरज ढलने को था, हम दोनों घर की ओर निकल पड़े, मेरे मन में एक ख़ुशी थी फिर से मेरी अनुराधा की उजड़ी मांग को उसके पिता ने सजाने की जो ठानी थी उसे आदित्य जैसे अच्छे व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति पूरा करने को तैयार था ।


#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला  #मचान 
-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार)
दिनांक- १७/०६/२०१७
Share:

Wednesday, 31 May 2017

आलेख सं : २

शीर्षक : "संवेदनशीलता की गोद में"

-------------------------------------------------------------------------------------------------

आधुनिक होते हमारे समाज में हम नित नए मित्र, सुख-सुविधाओं और ठाठ-बाट भरी जीवन जीने की चाह में अपने पास के अमूल्य मित्रों, अनुभवों, धरोहरों और सुख-शांति को खोने की ओर अग्रसर प्रतीत होते हैं ऐसा होना तो लाजिमी हैं क्योंकि जब कोई समाज समग्रता को छोड़कर एकलता ओर अग्रसर हो जाये  जैसे- मेरा घर, मेरा खेत और मेरा मित्र इत्यादि  

समाज का अंग्रेजी शब्द सोसाइटी लैटिन भाषा के सॅाशियस से निकला हैं, जिसका अर्थ कॉमरेड, दोस्त और बंधु होता हैं यानी कि ऐसा समूह जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे की विकट परिस्थितियों में सहायता करने को आगे आते हुए अपने सहभागिता से समाज की बगिया को स्पंदित करता हों

Like Us : www.facebook.com/kahaninaama

जैसे-जैसे मानवजाति ने आधुनिकता को अपने मन के आवरण पर द्वेष, ईर्ष्या और दंभ को पैर पसारने का अवसर देना शुरू किया तो हमारा मन द्वारा समाज के कोमल भाव को समझने से ज्यादे समाज में व्याप्त विकट व्यव्हार को ह्रदय से लगाना बेहतर समझा  भाग-दौर से भरी इस जिंदगी में हम सरसता से कोसो दूर होते जा रहे सरसता में ही समभाव अपनी पैठ को पल्लवित कर पाता हैं क्योंकि अपनी प्रसन्नता सब के साथ बाँट कर उसे दुगुना कर सकता है

आज जब हम मंगल, चन्द्रमा और अन्य ग्रह पर पहुंचने की बात कर रहे हैं तो शायद अपनी आत्मा से कोसों दूर जाने की राह को आत्मसात करने की ओर बढ़ चले हैं हमारा मन शायद मढ़ित आभा की ओर आसानी से आकृष्ट हो जाता है, जो हमें असंवेदनशील के पक्ष में ले जाने के लिए काफी हैं

शायद हम इतने कमजोर हो गए है कि अपने मन पर संतुष्टि की आभा को उद्वेलित नहीं कर सकते और जब तक संतुष्टि की आभा नहीं जगमगायेगी तब तक हमारा मन संवेदनशीलता को अपने आस-पास भी नहीं भटकने देगा जबकि संवेदनशीलता हमे आत्मबल, चरित्रवान, दयालु, कर्मठ, पथप्रदर्शक और सामाजिक इत्यादि बनाती बनाती हैं लेकिन इसके बावजूद हम इससे भागते हैं क्योंकि हम कृतिम आनंद में रहकर ही खुश हो जाना पसंद करते हैं

आज भारत में ऐसा दौड़ चल पड़ा हैं कि तनाव को दूर करने के लिए फूहड़, द्विअर्थी या किसी एक समूह (लिंग, क्षेत्र और धर्म इत्यादि ) को लक्ष्य करके लोगों के मन को कुछ पल के लिए ही सही सुकून मिल जाता हैं लेकिन ये कुछ पल के लिए ही होता हैं

कुछ पल की प्रसन्नता दिमाग को सुकून तो दे सकता हैं मगर आत्मा की प्रसन्नता "मन और दिमाग" दोनों को  हर समय एक अलग अनुभूति की प्राप्ति होती हैं समाज को संकुचित का छोड़ वृहत मानसिकता को आत्मसात करने की जरुरत हैं आधुनिक संचार के इस युग में व्हाट्सप और फेसबुक जैसे सोशल साइट पर तो हम बहुत संवेदनशील दिखते हैं मगर समाज के गंभीर मुद्दे पर समाज में अपनी बात रखने से कतराते हैं इस कमी को जितनी जल्दी समाज के द्वारा दूर कर लिया जाये समाज उतनी ही जल्दी संक्रमण से निकल जायेगा

समाज को सामाजिक विद्वान् टैरी के शब्दों को याद रखने की जरुरत हैं "जैसे की दूसरों को ज्ञान बाँटते समय, दूसरों को ज्ञान भी मिल जाता हैं तथा बाँटने वाले के पास भी ज्ञान रहता हैं " इस बात को आत्मसात करते हुए समाज को आगे बढ़ने की जरुरत हैं

#HINDI #ARTICLE

#मिथिला #बैसार

-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला ), बिहार। 
दिनांक- ३१/०५ /२०१७
Share: