Tuesday, 13 December 2016

"नव पल्लव"

लघु कथा सं-९
शीर्षक-"नव पल्लव"~~~

------------------------------------------------------------------------------------------------------------

वैवाहिक निमंत्रण-पत्र पढ़ते ही अनायास "ओस की बूँदे कुछ इस तरह से मेरे मन के आँगन में टिप-टिप कर बरबस ही पसर रही थीं कि मेरे यादों के समुद्र में मैं सरपट गोता लगाने लगा" । आज बाबूजी को हमे छोड़कर गए हुए लगभग आठ बरस होने को हैं मगर लगता ही नहीं कि वो हम सबको छोड़कर दूसरी दुनिया जा चुके हैं- मैं तो आज तक इस बात को स्वीकार नहीं कर पाया । उनका प्रेम ही कुछ इस तरह था हमारे लिए की हम तीनो भाईयों को अपने से ओझल देखते ही परेशान हो जाते उनको हमारा ओझल होना शायद बर्दाश्त नहीं था, उस समय इस बात को लेकर हम तीनों झुंझलाते भी थे उस समय उनके प्यार को समझना शायद हमारे बस से बाहर थी मगर आज जब हमारे खुद के बच्चें हैं तो उनकी व्याकुलता समझ में आने लगी हैं । जब तक महाविद्यालय (कॉलेज) से मैं घर नहीं आ जाऊ बड़ी भाभी से पूछ-पूछकर खुद भी परेशान होते और भाभी को भी परेशान करते ये जानकर भी कि मेरे आने का समय अभी नहीं हुआ हैं ।

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama


उनकी जिंदगी जब तक हम सबको ढूँढ़ती रहती, उनका ये कहना था कहीं भी रहों मगर शाम होते-होते घर पहुँच जाओ ये उनका आदेश नहीं प्यार ही था जो हम सबको उनके बातों पर हमारी मुहर लगा देती, हम सबों का सब साथ में एक ही मेज पर खाना खाना होता था (बेटे और बहू में कोई अंतर नहीं एक संग) जो आज भी बाबूजी के चले जाने के बाद जारी हैं । 

किन हालातों में उन्होंने हम तीनों भाइयों की परवरिश में अपना सर्वस समर्पित कर दिया था बाबूजी ने माँ के मर जाने के बाद, उनके त्याग से हमारा रोम-रोम बखूबी वाकिफ था । अभी बमुश्किल से मैंने दो वसंत ही देखें थे कि माँ भगवान को प्यारी हो गई, बाबूजी पर तो जैसे दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा- घर में तीन छोटे-छोटे बच्चें और एक बीमार बूढी माँ ।

उन दिनों हैजा का प्रकोप अपने चरम सीमा पर था जिसने मेरी माँ को भी अपने कालबंधन में जकड़ लिया, हैजा ने हमसे जिंदगी भर के लिए माँ का आँचल छीन लिया । बाबूजी ने अपनी तरफ से माँ के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी थीं लेकिन शायद भगवान ने हमारे भाग्य में एक ही इंसान से माँ-बाप दोनों का वात्सल्य प्रेम लिख रखा था । माँ की बीमारी का जब तक डॉक्टरों को पता लगता तब तक देर हो चुकी थी, डॉक्टरों के अथक प्रयास पर हैजा का काल-बंधन भरी पड़ा ।  

मेरी छोटा होने के कारण उस समय मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था दो साल का बच्चा होता ही कितना सयाना हैं, लेकिन बड़े भैया और छोटे भैया जो कि उस समय क्रमश: आठ वसंत और चार वसंत देख चुके थे को भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि घर में हुआ क्या हैं बस हम तीनों भाई दादी को लिपटकर दादी के साथ रो रहें थें । कुछ लोग दादी को हम तीनों की याद दिलाकर चुप होने को भी बोल रहे थे लेकिन कैसे कोई अपने के जाने पर चुप हो सकता था जिससे उस घर के लोगों की दुनिया बिना दौड़नी थीं, घर को उसकी लक्ष्मी ही तो स्वर्ग बनाती हैं । 


माँ का क्रिया-कर्म संपन्न होनें के बाद, दादी और बाबूजी को हम तीनों भाइयों की चिंता थीं, मगर बाबूजी ने ये बातें दादी से कभी नहीं की । माँ जब इस दुनिया में थीं तब भी बाबूजी बड़े भैया को पाठशाला साथ ले जाते थे अब छोटे भैया को भी साथ ले जाने लगे थे । बाबूजी पाठशाला जाने से पहले जितना उनसे हो सकता था दादी की सहयोग करके जाते, लेकिन घर में काम हे इतने होते थे कि इतना सब कुछ कर जाने के बाद भी दादी को बहुत काम करना पड़ता था घर में तीन छोटे-छोटे बच्चें जो थे ।


बाबूजी दोनों भैया को अपने साथ पाठशाला ले जाते पढ़ने को और इधर घर पर अकेला मैं ही रह जाता था दादी के स्नेहल बगिया में जहाँ उनके प्यार रूपी जल से मेरी फूलों जैसा मन आनंदित हों जाता । दादी के बीमार होने के कारण उनका शरीर बोल जाता इसके बावजूद उन्होंने अपने मन रूपी बगिया को मेरे लिए हर वक़्त गुलजार रखती बिना किसी शिकायत के, कभी-कभी भाई दोनों दादी के प्यार-भरे प्रेम को देख जलते भी थें ।


धीरे-धीरे मैं अपने घर के लिए खिलौना रूपी ख़ुशी की वजह बन गया था, घर में हर कोई मेरे नटखट उन्मुक्त अदाओं का आनंद लेते । दादी के प्यार से मैं इतना ओत-प्रोत रहता की दोनों भैया के पास जाता ही नहीं, इसलिए दोनों भैया मुझे हर वक़्त अपने प्रेम के पालने में लाना चाहते लेकिन मैं हर वक़्त दादी के बगिया में अपने को सुरक्षित समझता ।

माँ के पहली बरसी होने के बाद, दादी बार-बार बाबूजी से फिर से शादी कर लेने को बोलती उनकी नहीं सुनते तो दूसरों से कहवाती मगर बाबूजी ने ठान लिया था कि इस बात पर किसी सुननी ही नहीं हैं शायद उन्हें हमारे कोपल मन को भविष्य के लिए संचित जो करना था । माँ के आकस्मिक निधन ने बाबूजी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था, उन्हें फ़िक्र थी तो दादी और हम तीनों भाइयो की । समय के साथ हम तीनों घर के काम में हाथ बटाने लगे थे बड़े भैया तो अब खाना भी बना लेते थे ।

समय इतनी तेजी से सरपट दौड़ता हैं कि पता ही नहीं चलता, बड़े भैया ने कब स्नातक और छोटे भैया ने अंतर स्नातक उतीर्ण कर ली पता भी नहीं चला । स्नातक किये हुए साल हुए होंगे की उनकी सरकारी नौकरी लग गये, घर में उल्लास का माहौल बन गया और बाबूजी थोड़े निश्चिन्त दिखने लगे थे । बाबूजी के अवकाश में ज्यादा साल नहीं रह गए थे बमुश्किल से पाँच साल रहे होंगे लेकिन अब उनकी चिंता कम हो चली थी । घर में अब भैया कि शादी दबे पाँव ही मगर शुरू हो चुकी थी । सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन दादी ने भी हम सब का साथ छोड़ ये घर अब लक्ष्मी विहीन था बाबूजी अब भैया की शादी जल्द से जल्द करवाना चाहते थे । दादी की बरसी के कुछ दिन बाद ही भैया की शादी बगल के गाँव में बाबूजी के करीबी मित्र की बेटी से तय हुई, दो महीने बाद शादी हो गई । भाभी बहुत सुन्दर, सुशील और सर्वगुण संपन्न तो थी ही साथ ही हम सब की प्यारी भी, उनके आने से दादी के मरने के बाद मुरझाये फूल जैसे फिर से खिल उठे ।

एक साल बाद छोटे भैया की भी सरकारी नौकरी लग गई भैया को प्रशिक्षण के लिए राँची जाना था, छः महीने के प्रशिक्षण के बाद उनका पहला पदस्थापना बगल के जिले में हो गई । सब कुछ सही चल रहा था, बाबूजी छोटे भैया की शादी करने को लेकर एक दिन बड़े भैया और भाभी से चर्चा की तो दोनों ने हामी भर दी । लड़की वाले आने लगे, उनमें से शिक्षिका पर सबकी सहमति थी, अब बस छोटे भैया की सहमति के लिए भाभी ने उनसे अलग में राय ली तो उन्हें भी वो पसंद थीं । शादी बड़े धूम-धाम से हों गई, घर को दो-दो लक्ष्मी मिल चुकी थी ।

समय बढ़ता गया इसी बिच बड़ी भाभी ने वंश को कुलदीपक दिया बाबूजी फूले नहीं समां रहे थे, लेकिन इस ख़ुशी के साल भर नहीं बीते होंगे कि इस हँसते-खिलखिलाते घर को किसी की बुरी नजर लग गई शायद होनी को कुछ और मंजूर था क्योंकि भगवन ने हमारे घर के लिए कुछ और ही लिख चुके थे । छोटे भैया की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई, इस हादसे ने छोटी भाभी पर ब्रजपात तो गिराया तो था ही साथ ही बाबूजी की भी उम्र कम कर दी थी । इस घटना के बाद से भाभी होशों-हवास में नहीं थी, लेकिन इस विषम परिस्थिती में भाभी ने छोटी भाभी को उस बुरे दौर से निकालने की ठानी, उनके अथक प्रयास से छोटी भाभी धीरे-धीरे ही सही मगर सदमे से उबरने लगी ।

इधर बाबूजी का दिमाग कही खोया-खोया रहता, बड़ी भाभी का उनको समझाना भी काम नहीं आ रहा था । जिसका हम सब को डर था वो हो ही गया, बाबूजी को रक्त-चाप की दिक्कत आ ही गई साथ में सिर का दर्द करना आम हो चला था । एक दिन अचानक ही बाबूजी को दिल का दौर पड़ा, पहला अटैक था तो डॉक्टर ने बचा लिया मगर आगे के लिए आगाह कर दिया ।

कुछ दिन बाद भैया के दोस्त की शादी में सब को जाना था, मगर बाबूजी खुद भी नहीं गये और मुझे भी रोक लिया । सबके जाने के बाद जब हम दोनों ने खा लिया और मैं बाबूजी का पैर दबा रहा था तो अचानक बाबूजी ने पूछा "तुम किसी लड़की से प्यार करते हों?" मैं कुछ देर विस्मित था फिर जब दुबारा उन्होंने पूछा तो मैंने नहीं कह दिया । तो बोले एक बात बोलू मैं जिससे शादी को बोलू करोगें उससे शादी, मैंने कहा बाबूजी आपके ही बताये रस्ते पे चलता आ रहा हूँ और आगे भी उसी पथ पर चलना हैं । मैं चाहता हूँ तू रक्षिता से शादी कर ले मैं गुमसुम रहा तो बाबूजी ने पूछा उसमें कोई कमी हैं क्या? मैंने ना में सिर हिला दिया ।

बाबूजी ने समझाते हुए कहा तेरा भैया तो उसे बीच भंवर में छोड़ गया, उसकी जिंदगी पहाड़ जैसी पड़ी हैं । तुम चाहो तो उसकी जिंदगी को खुशियो से भर सकते हों, जब कभी उसकी मांग उजड़ी देखता हूँ सामने अपने बेटे की लाश नजर आती हैं । मैंने उनसे कहा आप समाज के प्रतिष्टि लोगो से इस विषय पर बात कर लीजिये नहीं तो कही उल्टा-पुल्टा न बोलने लगे मुझे अपनी नहीं भाभी के इज्जत की चिंता हैं तो बाबूजी ने अपनी हामी भर दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि वो इस पर भाभी के पिता से भी बात करेंगे वैसे उन्हें किसी की चिंता नहीं है सिवाय अपनी बहू के ।

सुबह जब छोटी भाभी चली गई तो बाबूजी ने बड़ी भाभी से इस बारे में बात की और भाभी को मनाने को बोला तो बड़ी भाभी ने अपनी हामी भर दी । समाज के लोग इस बात में अपनी सहमति नहीं दी तो बाबूजी ने सब से मुह मोड़ लिया अब उन्हें बस अपनी बहू की रजामंदी चाहिए थी लेकिन वो भी नहीं मिल पा रही थी । इसी तकलीफ में एक दिन शाम को अचानक बाबूजी को दिल का दौर पड़ गया इस बार मरते-मरते बाबूजी बचे थे । जब होश में आये तो छोटी भाभी को पुकारा, भाभी रोते हुए उनसे लिपट गये तो बाबूजी ने मुस्कुराते हुए कहा जब तक तुम राजी ना हो जाओ मैं कही नहीं जा रहा । रघु एक अच्छा लड़का हैं उसके तुम अपना घर बसा लोगी तो मैं सुकून से मर सकूँगा, भाभी रोते हुए उन्हें अपनी स्वीकारोक्ति दे दिया । हमारे समाज में यदि किसी पुरुष की पत्नी मर जाए तो वो अविवाहित लड़की से शादी कर सकता है मगर एक विधवा दूसरी शादी नहीं कर सकती हैं । मेरी और भाभी की शादी करवाने के निर्णय ने उन्हें समाज में अलग-थलग कर दिया मगर उनकी दूर दृष्टिता ने कुछ दिन बाद समाज के युवा अवं महिलाओं को प्रेरित कर गया ।

ऐसे ही परिपाटी को बदलने की चाह रखते थे बाबूजी, हम सब उनकी सामाजिक सरोकार से जुड़ी बातो से अवगत थे मगर बाबूजी इतने उदार दिल वाले इंसान थे ये नहीं समझ पाए थे । एक महीने बाद बाबूजी ने मेरी शादी मंदिर में भाभी से करवा दी, थोड़ा अटपटा तो लग रहा था मगर अपनो की ख़ुशी में हे मेरी ख़ुशी थी । छः महीने बीत जाने के बाद हम दोनों नए रिश्ते को स्वीकार कर पाये थे, लेकिन कहते हैं ना प्रेम एक तरह की औषधि हैं जो धीरे-धीरे ही सही मगर घावों को भर देती हैं और लोग नए सपने बुनने लगते हैं उसी का फल था कि हमारे बीच संवाद का कोपल फूटने लगा था, संवाद ही रिश्तों की गरिमा आगे बढ़ाता हैं और वही हुआ । दो साल बाद हम दोनों के वीरान दुनिया में एक नन्हीं परी ने दस्तक दी, बाबूजी जैसे इसी दिन का इंतजार कर रहे थे हफ्ते दिन हुए नहीं की चल बसे ।

आज हमारा पूरा परिवार एक छत के नीचे ख़ुशी-ख़ुशी रहता हैं, भैया-भाभी के वात्सल्य प्रेम के छाँव में रक्षिता जैसी अर्धांगनी का स्नेह जीवन के हर कदम पर मिल रहा हैं एक इंसान को इससे ज्यादा क्या चाहिए इन सबके प्यार के संग परी जैसी बेटी का लड़कपन मेरे जीने की चाह को और पल्ल्वित कर जाता । बाबूजी सही मायने में हमारे समाज को दिशा दे कर विभूति के रूप में अपना नाम कर गए कितनी ही विधवाओं को सधवा बनने की सोच दे गए नहीं तो कुछ साल पहले तक उनलोगों का सोचना मात्र पाप समझा जाता था, इस पुनीत कार्य के लिए उन्होंने मुझे चुनकर मेरा जीवन को कृतार्थ कर दिया । उनके उच्च विचार के कारण ही छोटी भाभी के जीवन हरा-भरा तो हुआ ही संग ही समाज की कई विधवा की जिंदगी गुलजार होने का मार्ग-प्रस्त हुआ, ऐसे तो विरले ही लोग होते हैं जिन्हें अपने इज्जत से ज्यादा अपनों के दर्द की फ़िक्र रहती हों ।

यदि बाबूजी जैसी सोच समाज के हर माँ-बाप की हों जाये तो वह दिन दूर नहीं जब कितनी ही नारियों की उजड़ी जिंदगी में फिर से रंगों की अटखेलियाँ भरी जा सके, और यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि जिस समाज की नारियाँ खुश रहें उस समाज की प्रगति निश्चित हैं ।

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान

------------------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- १३ /१२/२०१६
Share: