Thursday, 24 November 2016

"दृष्टिकोण"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"दृष्टिकोण"~~~
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विद्यालय से आया ही था कि बगल के घर से रोहित कहीं चलने को बुलाने आया था । रास्ते में चलते-चलते उसने बताया भाई तुम्हारी मुँह बोली दादी अब नहीं रही । बुद्धिया दादी वैसे तो हमारे घर का चौका-बर्तन करती थी, लेकिन वो मेरे घर के लिए इज्जत की पात्र थी । मेरे घर में जब भी वो आती लगता था दादी का सानिध्य में प्रेम का रस जी लेता हूँ । मेरी अपनी दादी का स्वर्गवास मेरे जन्म से पहले ही हो गया था जबसे होश संभाला था उन्हीं को अपनी दादी समझता था क्योंकि वो मुझे मुझसे ज्यादा जो प्यार करती थी । ऐसा कभी लगा ही नहीं की वो हमारे परिवार की सदस्य नहीं हैं, उनका वात्सल्य प्रेम से मुझे ऐसा महसूस होता कि जैसे हमारा कोई पुराना नाता हैं । 

दादी जिंदादिल इंसान थी, अनपढ़ होते हुए भी सामाजिक रिश्तों के ताने-बूने को समझती थी और इसी गुण के कारण दूसरें के दर्द को अपना दर्द समझने लगती । इसी बीच हम दोनों आपके घर पहुँचे तो पता लगा, आपको घर नहीं लाया जा सका हैं, फिलहाल आप अस्पताल में ही हैं । आनन-फानन में हम दोनों अस्पताल पहुँचे तो देखा आपका बेटा जो कि बैंक में नौकरी करते हैं, किसी अंग-दान वाली संस्थान से संपर्क करने में व्यस्त थे । किसी ने बताया कि दादी ने अपना अंग-दान कर दिया हैं तो दादी की कहीं कुछ बातें जो उस समय मेरे से परे थी स्मृति-पटल पर सरपट दौरने लगी ।

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बोलती थी मैं रहूँ ना रहूँ मगर मेरा दिल और आँखें इस दूनिया में जीवित रहेगी । लेकिन उस समय छोटा होने के कारण उनकी इस छोटी सी मगर मोटी बात को मैं समझ नहीं पाता था ।

लोगों का तांता लगा था दादी को देखने के लिए, हमारे गाँव ही नहीं अपितु पूरे जिले में पहली इंसान थी जिन्होंने अपना अंग-दान किया था, आज मेरे नजर में उनका स्थान पहले से बढ़ गया । लोग बता रहें थे कि दादी के पति की मौत किडनी फेल होने के कारण हो गई थी । चिकित्सक ने उनसे कहा था कि की काश यदि ट्रांसप्लांट करने के लिए किडनी मिल जाती तो आज तुम्हारे पति शायद जिंदा होते । जबकि हर दिन हजारों लोगों मरते हैं और यदि उनमें से आधे भी अपना अंग किसी दूसरे के लिए दान कर जाते तो हजारों को नया जीवन मिल सकता हैं साथ ही मरे हुए इंसान को दूसरे के नजर से इस दूनिया में ना रहते हुए भी इस दूनिया को देखते रहने की सौगात मिल जाती ।

दादी के मृत शरीर के पास बैठे उनकी बहू-बेटी की आँखों में आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, उनकी उम्र ही क्या हुई होगी लगभग पचास के करीब तो थी । मैंनें बुआ का हाथ थाम भावावेश में फफक-फफककर रोने लगा तो वो भी रोते हुए बोलने लगी, देख ना आशु, मेरे माँ के मरने पर भी ये लोग उसके शरीर को छलनी करने को आतुर हैं, क्या अकेले मेरे माँ के अंगदान करने से पूरे संसार के लोगों की जान बच जाएगी? हमारी सुनता कौन हैं? अब इस पर मेरा अधिकार नहीं मैं पराई जो हो ठहरी ।

तभी दादी के बेटे भी वहाँ पहुँच गये और बोला, ये पूरी तरह से माँ का व्यक्तिगत निर्णय था । जब बाबा मरे थे तो चिकित्सक ने माँ जो कुछ कहा उन बातों ने माँ के दिल को अंदर तक झकझोर गया । जिस समय बाबा मरे उस समय उनकी उम्र ही क्या रही थी २८-२९ (28 -29) साल जब वो मरे तो एक इंसान की मौत नहीं हुई थी अपितु एक खुशहाल परिवार की मौत हुई थी । माँ ने हम लोगों को कैसे पाला-पोषा वो तुम मेरे से ज्यादे अच्छे से जानती हों । यदि उस समय लोगों में अंग-दान करने की प्रवृत्ति होती तो शायद उनकी ये जिंदगी वीरान ना होती । और इन्हीं सब बातों ने माँ को अपना अंग-दान करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने अपने पति के पहली बरसी पर अपना अंग-दान करने के लिए पंजीयन करवाया था ।

मुझे तो गर्व हैं अपनी माँ पर और तुम्हें भी माँ के इस फैसले पर गर्व करना चाहिए कि माँ की सोच कितनी स्वभाविक एवं व्यावहारिक थी । समाज में अपने शक्ति के हिसाब से लोगों के सुख-दुख में साथ रहने वाली मरने के बाद भी आठ-दस लोगों के जीवन को गुलजार कर गई हैं । ये माँ की अंतिम इच्छा थी और मैं अपनी माँ की सारी इच्छा पूरी करूँगा, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर मैंने और तेरी भाभी ने भी फैसला कर लिया हैं की हम भी अंग-दान करेंगे ।

काश ! दादी और उनके बेटे की तरह हर किसी की सोच हों जाये तो भारतवर्ष में प्रतिवर्ष लाखों लोगों को नया जीवन ही नहीं मिलेगा बल्कि कोई असमय ही काल का कोपभाजन नहीं बन पाएगा ।

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#मिथिला #मचान
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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- २४ /११/२०१६
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