Thursday, 24 November 2016

"दृष्टिकोण"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"दृष्टिकोण"~~~
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विद्यालय से आया ही था कि बगल के घर से रोहित कहीं चलने को बुलाने आया था । रास्ते में चलते-चलते उसने बताया भाई तुम्हारी मुँह बोली दादी अब नहीं रही । बुद्धिया दादी वैसे तो हमारे घर का चौका-बर्तन करती थी, लेकिन वो मेरे घर के लिए इज्जत की पात्र थी । मेरे घर में जब भी वो आती लगता था दादी का सानिध्य में प्रेम का रस जी लेता हूँ । मेरी अपनी दादी का स्वर्गवास मेरे जन्म से पहले ही हो गया था जबसे होश संभाला था उन्हीं को अपनी दादी समझता था क्योंकि वो मुझे मुझसे ज्यादा जो प्यार करती थी । ऐसा कभी लगा ही नहीं की वो हमारे परिवार की सदस्य नहीं हैं, उनका वात्सल्य प्रेम से मुझे ऐसा महसूस होता कि जैसे हमारा कोई पुराना नाता हैं । 

दादी जिंदादिल इंसान थी, अनपढ़ होते हुए भी सामाजिक रिश्तों के ताने-बूने को समझती थी और इसी गुण के कारण दूसरें के दर्द को अपना दर्द समझने लगती । इसी बीच हम दोनों आपके घर पहुँचे तो पता लगा, आपको घर नहीं लाया जा सका हैं, फिलहाल आप अस्पताल में ही हैं । आनन-फानन में हम दोनों अस्पताल पहुँचे तो देखा आपका बेटा जो कि बैंक में नौकरी करते हैं, किसी अंग-दान वाली संस्थान से संपर्क करने में व्यस्त थे । किसी ने बताया कि दादी ने अपना अंग-दान कर दिया हैं तो दादी की कहीं कुछ बातें जो उस समय मेरे से परे थी स्मृति-पटल पर सरपट दौरने लगी ।

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बोलती थी मैं रहूँ ना रहूँ मगर मेरा दिल और आँखें इस दूनिया में जीवित रहेगी । लेकिन उस समय छोटा होने के कारण उनकी इस छोटी सी मगर मोटी बात को मैं समझ नहीं पाता था ।

लोगों का तांता लगा था दादी को देखने के लिए, हमारे गाँव ही नहीं अपितु पूरे जिले में पहली इंसान थी जिन्होंने अपना अंग-दान किया था, आज मेरे नजर में उनका स्थान पहले से बढ़ गया । लोग बता रहें थे कि दादी के पति की मौत किडनी फेल होने के कारण हो गई थी । चिकित्सक ने उनसे कहा था कि की काश यदि ट्रांसप्लांट करने के लिए किडनी मिल जाती तो आज तुम्हारे पति शायद जिंदा होते । जबकि हर दिन हजारों लोगों मरते हैं और यदि उनमें से आधे भी अपना अंग किसी दूसरे के लिए दान कर जाते तो हजारों को नया जीवन मिल सकता हैं साथ ही मरे हुए इंसान को दूसरे के नजर से इस दूनिया में ना रहते हुए भी इस दूनिया को देखते रहने की सौगात मिल जाती ।

दादी के मृत शरीर के पास बैठे उनकी बहू-बेटी की आँखों में आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, उनकी उम्र ही क्या हुई होगी लगभग पचास के करीब तो थी । मैंनें बुआ का हाथ थाम भावावेश में फफक-फफककर रोने लगा तो वो भी रोते हुए बोलने लगी, देख ना आशु, मेरे माँ के मरने पर भी ये लोग उसके शरीर को छलनी करने को आतुर हैं, क्या अकेले मेरे माँ के अंगदान करने से पूरे संसार के लोगों की जान बच जाएगी? हमारी सुनता कौन हैं? अब इस पर मेरा अधिकार नहीं मैं पराई जो हो ठहरी ।

तभी दादी के बेटे भी वहाँ पहुँच गये और बोला, ये पूरी तरह से माँ का व्यक्तिगत निर्णय था । जब बाबा मरे थे तो चिकित्सक ने माँ जो कुछ कहा उन बातों ने माँ के दिल को अंदर तक झकझोर गया । जिस समय बाबा मरे उस समय उनकी उम्र ही क्या रही थी २८-२९ (28 -29) साल जब वो मरे तो एक इंसान की मौत नहीं हुई थी अपितु एक खुशहाल परिवार की मौत हुई थी । माँ ने हम लोगों को कैसे पाला-पोषा वो तुम मेरे से ज्यादे अच्छे से जानती हों । यदि उस समय लोगों में अंग-दान करने की प्रवृत्ति होती तो शायद उनकी ये जिंदगी वीरान ना होती । और इन्हीं सब बातों ने माँ को अपना अंग-दान करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने अपने पति के पहली बरसी पर अपना अंग-दान करने के लिए पंजीयन करवाया था ।

मुझे तो गर्व हैं अपनी माँ पर और तुम्हें भी माँ के इस फैसले पर गर्व करना चाहिए कि माँ की सोच कितनी स्वभाविक एवं व्यावहारिक थी । समाज में अपने शक्ति के हिसाब से लोगों के सुख-दुख में साथ रहने वाली मरने के बाद भी आठ-दस लोगों के जीवन को गुलजार कर गई हैं । ये माँ की अंतिम इच्छा थी और मैं अपनी माँ की सारी इच्छा पूरी करूँगा, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर मैंने और तेरी भाभी ने भी फैसला कर लिया हैं की हम भी अंग-दान करेंगे ।

काश ! दादी और उनके बेटे की तरह हर किसी की सोच हों जाये तो भारतवर्ष में प्रतिवर्ष लाखों लोगों को नया जीवन ही नहीं मिलेगा बल्कि कोई असमय ही काल का कोपभाजन नहीं बन पाएगा ।

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान
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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- २४ /११/२०१६
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Tuesday, 15 November 2016

"ठहराव से आगे"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"ठहराव से आगे"~~~

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अपने कक्षा के प्रवेश द्वार पर जैसे ही मैं और मेरा दोस्त रमापति पहुँचे, कक्षा में इतिहास की शिक्षिका का पहले ही आगमन हो चुका था । मगर ये क्या आज सरोजनी मैडम की जगह कोई नई प्राध्यापिका पढ़ाने आई हैं । हम दोनों ने कक्षा में प्रवेश देने के लिए उनसे आज्ञा माँगी और उन्होंने बिना समय गंवाये हमे कक्षा में आने की अनुमति दे दी । कक्षा का अवलोकन करते हुए उन्होंने अपने बारे में हल्की-हल्की मुस्कान के साथ संक्षिप्त में बताना शुरू किया, वातावरण में जैसे फूलों के फव्वारें हवा में तैर रहें थे । इसी बीच उन्होंने अपना नाम प्ररेणा सिंह बताया और वो फिलहाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए (इतिहास) अंतिम वर्ष की छात्रा हैं और हमारे महाविद्यालय में अनियमित प्राध्यापिक के रूप इतिहास पढ़ाएगी । मैं बी.ए (अंतिम वर्ष) का छात्र हूँ व मैं और रमापति एक ही गाँव के हैं जो कि जिला मुख्यालय से बहुत दूर स्थिति हैं । रमापति और मैं अपने कक्षा के सामान्य छात्र रहें हैं, बी.ए (स्नातक) के अंतिम वर्ष तक सफर तय करने तक में पढ़ाई से ज्यादा हमने मस्ती की हैं । अभी तक हम दोनों ने अपने भविष्य के बारे में कुछ खास नहीं सोचा था, बस समय के बहाव में बहे जा रहे थे । आज प्ररेणा मैम ने हल्की-फूलकी बातें की ही थी कि घंटी बज गई और वो चली गई ।

मैम जितनी अच्छी वक्ता थी उतनी ही सुंदर भी और शायद दिल की उससे भी ज्यादा । दूसरे दिन मैम फिर पढ़ाने आई, आज वो हमारे कैरियर को लेकर बात कर रही थी । इतिहास का हमारे कैरियर में क्या महत्व हो सकता हैं, हम इसके महत्व को समझें तो क्या कर सकते हैं इत्यादि । ये सब सुनने के बाद इतिहास जो पहले मेरे स्नातक पास करने के लिए विषय मात्र थी अब नागमणि जैसी प्रतीत होने लगी थी । अब मैं मन लगाकर इतिहास की गहराई तक जानने कि कोशिश करने लगा था और इसमें मैं प्रेरणा मैम का सहयोग ले रहा था । हम दोनों हम उम्र होने के कारण अच्छे दोस्त बन गये थे, मेरा उनसे व्यक्तिगत रूप से रोज मिलना अब मेरी ज़रूरत बन गयी थी - उनको मेरी और मुझे उनकी, शायद मैं उनकी ओर आकर्षित या ये कहू कि मुझे उनसे प्यार हो लगा था तो इसमें कोई अतिशोयक्ति नहीं होगी । सब कुछ अच्छा चल रहा था, एक दिन मैंने उनसे प्रशासनिक प्रतियोगी परीक्षा के बारे में पूछा क्योंकि इसके बारे में मैम से कक्षा में कई बार सुन रखा था, मगर कभी इस परीक्षा को देने की नहीं सोची थी लेकिन इसका रूतबा मुझे आकर्षित कर रहा था । अब मैम मेरे जिन्दगी का अहम हिस्सा बन गई थी और उनसे एक दिन नहीं मिलना मुझे एक साल जैसे लगने लगता था, आज रविवार के दिन मेरा बुरा हाल हो रहा था । आज हिम्मत करके मैं मैम से मिलने उनके घर जाने की सोच रहा था, मगर मेरे जमीर ने मेरे पैरों में बेरिया डाल दिये ।

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अब कुछ ही दिन बचें थे अंतिम वर्ष की परीक्षा में, आज सोमवार को फिर मैम से मिलने उनके कैबिन में मिलने गया तो मैं मैम को देखता ही रह गया वो लाल साड़ी में क्या गजब की सुंदर लग रही थी, मेरी नजरे उनको एक टक देखता ही रह गया । जब मैम ने कहा कहाँ खो गये शशि तो मैं वर्तमान में लौटा वो शरमाहट के साथ और वो  मंद-मंद मुस्कुरा रही थी । उनके लिए आज मैं कुछ ज्यादा ही सोचने लगा था जबसे उनसे मिलकर आया, मन को थोड़ा गलत भी लग रहा था मगर प्यार को तो बस दिल ही समझें ।

अगले दिन मैम से मिलने की ठानी क्योंकि फाइनल एग्जाम में बहुत दिन नहीं रह गये थे और इसलिए मैम को बोल आया कि मैम कल आप छुट्टी ले लो मुझे आपसे अपने कैरियर के बारे में विस्तार से बात करनी हैं क्योंकि मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा यदि यही हाल रहा तो मैं बी.ए भी पास नहीं कर पाऊंगा, वो जरा मुस्कुराये और समय ना होने की बात बोल ना कह दिया, लेकिन मेरे अनुनय-विनय करने के बाद वो मान गयी और उन्होंने पूछा हम लोग कल कहा जा रहे हैं मैंने कहा कल हम लोग चिड़ियाघर चलेंगे इसी बहाने घूमना भी हो जायेगा और आपके गाइड से मुझे आगे क्या करना चाहिए उसका भी निर्णया हो जायेगा । हम दोनों तय समय पर चिड़ियाघर के प्रवेश-द्वार पर पहुँच गये, अंदर पहुँचकर हमने एकांत स्थान ढूँढा फिर इधर-उधर की बातें करते हुए हम दोनों ने अपने कैरियर के बारे में बात करनी शुरू की । मैम ने अपना कैरियर अध्यापन में ही बनाने कि बात कहीं और मुझसे पूछा कि तुम बी.ए के बाद क्या करोगें तो मैंने कहा मेरी इतिहास में रूचि तो हैं मगर साथ ही मेरा दिमाग प्रशासनिक सेवा की तैयारी करने को भी आकर्षित कर रहा हैं, तो मैम ने मुझे समझाना शुरू किया, तुम आगे एम.ए कर सकते हों उसके बाद नेट निकालो उसके बाद इतिहास के क्षेत्र में अनुसंधान कर इस विषय में अपनी विशिष्ट स्थान बना सकते हों या फिर जेनरल कंपटीशन की तैयारी कर के एक अच्छी नौकरी पा सकते हो, और यदि थोड़ा सी धैर्यता और लगन हों तो अपने दिमाग का उपयोग करते हुए समाज के लिए कुछ अच्छा करने की क्षमता रखते हों तो प्रशासनिक सेवा तुम्हारे लिए ही हैं मेरे दोस्त, तुम बेझिझक हो कर इसकी तैयारी कर सकते हों, भगवान ने बुद्धि तो दी ही हैं साथ ही कद-काठी भी डी.एम या एस.पी पोस्ट को सूट करेगा ।

मैम आज लाल साड़ी में इतनी सुन्दर लग रही थी की मैं अपने आँखों को उनके चेहरे से हटा ही नहीं पा रहा था, मैंने उनके खूबसूरती को अपने तारीफ का नाम दे दिया और वो हँसते हुए तारीफ स्वीकार कर गई । लेकिन पता नहीं कैसे अचानक बातों ही बातों में मेरे जुबान से निकल गया कि मैम मैं आपको पसंद करने लगा हूँ और बिना आपके मेरा जीवन शायद अधूरा हैं आप मेरे जीवन की जरुरत हों । निः शब्द होकर मैम, मुझे निश्छल भाव  निहार रही थी और कुछ देर बाद अपने आपको सँभालते हुए उन्होंने मुझे समझाने की मुद्रा में बोलना शुरू किया आप मेरे छात्र हों, ये अलग बात हैं कि हम अच्छे दोस्त हैं मगर ये बातें सोचना आप जैसे अच्छे इंसान को शोभा नहीं देती । मुझे उस समय कुछ समझ नहीं आ रहा था, पता नहीं मेरे दिमाग को क्या हो गया था, मेरी लोक-लाज कहा चली गई थी और कहाँ से इतनी हिम्मतआ गई थी की मैंने दुबारा मैम से मैंने पूछा, आप मुझे पसंद करती हैं क्या?, तो तपाक से मैम ने बोला तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हों गई तुम जैसे इंसान को अभी आपने कैरियर को बनाने पर ध्यान लगाना चाहिए ना कि इन सब बातों में अपना समय जाया नहीं करना चाहिए ये बस एक आकर्षण मात्रा हैं जो समय के साथ ख़त्म हो जायेगा । इसलिए अपने लक्ष्य की ओर सोचना शुरू करो ना कि मेरे बारे में, यदि जिंदगी में अच्छे सरकारी अधिकारी बन गए मेरे से ज्यादा सुन्दर लड़की के पिता जिनका की रुतबा भी होगा वो तुम्हारे दरवाजे पर आयेगे अपनी बेटी के लिए हाथ माँगने, मगर मैं था कि कुछ समझने की कोशिश नहीं कर रहा था बस बार-बार एक ही रट लगा रहा था कि "क्या मुझे आप प्यार करती हैं, हाँ तो क्या आप मुझसे शादी करेंगी" इससे खीज कर मैम गुस्से में बोली ठीक हैं लेकिन क्या तुम्हारी इतनी भी हैसियत हैं की तुम मेरी दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा कर सको । 

आज उनका प्रचंड रूप मेरे सामने था, वो इतने गुस्से में थी की उन्होंने खुद एक शर्त रख दी कि यदि तुम आई.ए.एस बन गए तो मैं तुमसे ख़ुशी-ख़ुशी शादी करूँगी उस समय तुम कहीं ना, ना कर दो मुझे इस बात का डर रहेगा । आज से मेरा ये मन तुम्हारी अमानत और इसको संभाल कर रखना मेरी जिम्मेवारी ।  मैंने उनसे भारी मन से विदा लिया, इन वादों के साथ की- कि बी.ए परीक्षा के बाद मैं तैयारी के लिए दिल्ली चला जाऊँगा यदि सफल हुआ तो आपसे मिलूँगा वरना कभी नहीं । पूरे रास्ते भर मैं यही सोचता रहा मैं ये सब कैसे करूँगा साथ ही बिना मैम के मैं कैसे रह पाऊंगा लेकिन संग-संग एक जुनून जो सवार हो गया था मैम से किया वादा जो पूरा करना था हर हाल में अब । 

इसी बीच बी.ए की परीक्षा आरंभ हो गयी और कुछ दिनों में परीक्षा फ़ल भी आ गया  मैं इस वर्ष अपने वर्ग में  प्रथम आया था और यह सब मैं पिछले साल तक सोच भी नहीं सकता था यह तो प्रेरणा मैम के कारण संभव हो पाया था । अब मैं अपने नए लक्ष्य को पाने के लिए दिल्ली रवाना हो चुका था, कुछ दिन तक तो मेरा उनके बिना मन नहीं लगा उनकी आदत जो लग गई थी, लेकिन जिस मकसद से मैं दिल्ली आया था वह ध्येय भी बार-बार स्मरण हो रहा था । एक बार तो मन हुआ सब कुछ छोड़-छाड़ कर मैम के पास चला जाऊँ लेकिन फिर अपने वादे याद आते, वो वादे ही मेरे दृढ़ निश्चय की वजह बनी । और अब मेरा एक ही ध्येय रह गया था आई.ए.एस बनना और बस दिन रात-दिन उसके लिए ही जी जान से मेहनत करना ।

समय बीत ता गया, फार्म भरने की तारीख अपने समय पर आइ मगर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे परसों की ही तो बात हैं जब मैंने तैयारी शुरू की हैं । मैंने फार्म भरा और दुगूने मन से लग गया तैयारी में, लगभग दो महीने बाद मेरा प्रवेश-पत्र भी आ गया मेरे तैयारी किस स्तर की हैं वो भी दिखाने का समय आ गया था । मैं अब रिविजन में लग गया, सब कुछ अचल चल रहा था। मैं अपने तैयारी से संतुष्ट था, बस अब मुझे अपने मन और दिमाग  को परीक्षा-भवन में एकाग्रचित रखना था । समय इतनी तेजी से बीता रहा था कि की आई.ए.एस (प्री) एग्जाम देने का दिन भी बहुत क़रीब आ गया अगले रविवार को मेरा पेपर होना था जिसके कारण मेरे ऊपर थोड़ा दबाब था  मगर एग्जाम का दिन आते-आते मेरे सारे तनाव दूर हो चुके थे । मेरा एग्जाम उम्मीद के अनुसार गया, मुझे अपने पर विश्वास था कि मैं प्री आसानी से क्वालीफाई कर जाऊँगा इसलिए मैं मुख्य परीक्षा की तैयारी में जोश-खरोश से लग गया ।

एक महीने के बाद एक दिन रात के करीब ११ (11) बजे मेरे एक  दोस्त का फ़ोन आया जो खुद भी आई.ए.एस की तैयारी कर रहा था ने बताया कि परिणाम आ गये नेट पर देख लों मैंने उसके बारे में पूछा तो उसने अपने सफल होने की बात कहीं मैंने उसे बधाई दी और के लिए ढ़ेर सारी शुभकामनाएं दी । मेरा नेट काम नहीं कर रहा पाया तो  मैंने रमापति को फ़ोन लगाया तो वो नेट पर ही काम कर रहा था, उसने जैसे ही कहा मुँह मीठा करा मैं समझ गया मैंने मुख्य परीक्षा के लिए क्वालीफाई कर लिया हैं, आज पूरी रात नींद ना आनी थी।  मुख्य परीक्षा के लिए मैंने दिन रात एक कर दिये, रोज हर विषय को पढ़ना और उनको अपनी भाषा में मेरा दिनचर्या हो गया था । मेरी तैयारी समय के साथ और अच्छी होती गई । मुख्य परीक्षा भी शुरू हो गये, थोड़े थकाऊ मगर उम्मीद भरें । जितने पेपर होते गये लक्ष्य उतने करीब दिखता गया, क्योंकि सारे पेपर अच्छे हो रहे थे । सारे पेपर अच्छे होने के कारण मैं साक्षात्कार की तैयारी में लग गया, समय बीतता गया मैं एक अलग ही दुनिया में जी रहा था जहाँ मैं अपने होने की कभी सोच भी सकता आज से दो साल पहले तक मगर आज मैं आई.ए.एस बनने सोच रहा हूँ तो बस अपने प्यार के मार्गदर्शन के और आज अपने लगन के कारण ।

मुख्य परीक्षा के परिणाम भी मेरे पक्ष में आये थे वो अच्छे नंबरों से और मैं आई.ए.एस बनने से बस एक दूर थ, और इसी परिस्थिति में अपने बौद्धिक क्षमता के संग लोगों के बीच अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने की कला में निखार लाने की कोशिश में लगा था और उसमे बहुत हद तक सफल भी हो रहा था । इन्हीं सब के बीच मुख्य परीक्षा के परिणाम आ गए, मैंने यह चरण बहुत अच्छे अंको से क्वालीफाई किया था इससे मेरे आई.ए.एस सेवा में आने को पंख लग गए, शायद इस बार भी भगवान ने मेरे परिश्रम का फल मेरे भाग्य में डाल दिया था ।

अब बस मुझे साक्षात्कार अच्छे से हो जाये इसकी चिंता थी क्योंकि हर किसी के मुँह से डरावनी बाते सुनी थी।  आज वो दिन आ गया था जिसको मैं आज के दिन भी सपने जैसा समझ रहा था ।  मुझे साक्षात्कार के लिए दिल्ली ही बुलाया गया । साक्षात्कार लेने वाले बोर्ड का व्यवहार सहियोगात्मक था जिसके कारण मेरा साक्षात्कार बहुत अच्छा हुआ,  आज तक जितना उनके बारे में बुरा सुना था सब सरा-सर गलत था । अब मैं पूरी तरह से आश्वत था कि मेरा दो सौ (२००) के अंदर नाम आयेगा । तब भी मैं आगे कि तैयारी में लग रहा, थोड़े तनाव में भी था मगर आशा बनी हुईं थी ।

वो दिन भी आ गया जिसका मुझे ही नहीं मेरी जिंदगी को भी बेसब्री से इंतजार था । मेरे जिंदगी का सबसे अहम दिन आ गया था मैं अपने लक्ष्य में सफल हुआ था मैंने १५८ (158वाँ) स्थान पाया था और आई.पी.एस (पुलिस सेवा) मिलने की उम्मीद थी । परिणाम आते ही मैंने अपने बोरिया-बिस्तर समेटा और आज दो साल बाद घर जाने को सोचा वो भी अपने वादे के पुरा करने के बाद । मैंने बिना किसी को बताये घर पहुँचा और मैंने जब माँ-बाबू जी को ये खुश खबरी दी तो बाबू जी नम आँखों से गले लगा लिया और माँ तो बस रो रही थी ये ख़ुशी के आँसू हर बेटा अपने माँ-बाप के चरणों में रखना चाहेगा ।  धीरे-धीरे ये समाचार मोहल्ले में फ़ैल गई, मोहल्ले के लोगों का बधाई देने का सिलसिला चला वो शाम तक चलता रहा। अगले दिन मेरा इंटरव्यू लेने दैनिक अखबार के पत्रकार मेरे घर आ गये, उसके अगले दिन अखबार में मेरा इंटरव्यू छपा था । आज परसो से भी ज्यादा लोगों का तांता लगा हुआ था, दोपहर को मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य के साथ दो-चार शिक्षक भी आये थे मगर जिसका इंतजार था वो ना आया। शाम को मेरे साथ के कुछ दोस्तों के साथ कुछ जूनियर भी मिलने आये, बधाई देने के बाद उन्हीं में से एक बच्चे ने बोला सर हम लोग आपके सम्मान में एक छोटा सा समारोह करना चाहते हैं आप अपना कीमती समय कब दें सकते हैं मैंने कहा जब तुमलोगों कहो लेकिन जो करना हों इस सप्ताह में कर लो बस एक दिन पहले बता देना, क्योंकि हो सकता हैं अगले हफ़्ते मुझे निकलना पड़े ।

मंगलवार को महाविद्यालय से फ़ोन आया की बच्चों ने तैयारी कर ली, क्या कल आप अपना समय दें सकते हैं, मैंने दस बजे के लिए अपनी हामी भर दी । सुबह-सुबह मोहल्ला के ही वो बुधवार भी आ गया जिसका मुझे दो बरस से इंतजार कर रहा था, महाविद्यालय परिसर में पहुँचते ही मेरी नजरे बेसब्री से प्रेरणा मैम को ढूँढ रही थी । लेकिन वो कहीं नजर नहीं आ रही थी, मैं अपने हावभाव से शांत दिखने की कोशिश कर रहा था लेकिन मेरी ये कोशिश नाकाफी हो रही थी हो भी क्यों ना, दिल किसी की सुनता थोड़ी ना हैं वो तो बस अपनी ही करता हैं । मेरी निगाहें तो बस प्रेरणा मैम को ढूँढ रही थी लेकिन पता नहीं वो कहीं दिख क्यों नहीं रही थी । मैंने जब चपरासी से पूछा तो उसने कहा मैडम आयी तो हैं लेकिन अभी दिखी नहीं रही, शायद कार्यक्रम की तैयारी में लगी हों । कुछ देर के बाद मंच से उद्घोषणा शुरू हुई कमला मैम मेरे बारे संक्षिप्त में बता रही थी इसी बीच उन्होंने प्रेरणा मैम का नाम मुझे स्मृति चिन्ह से सम्मानित करने के लिए बुलाया । मेरा दिल धड़क भी रहा था और उनको देखने के लिए बेचैन भी होये जा रहा था, मैं ये सब सोच ही रहा था वो भीड़ से निकलते ग़ुलाबी साड़ी में क्या सुन्दर लग रही थी बताना मुश्किल हैं (जिसके कारण मैं आज यहाँ तक पहुँच पाया उसी से सम्मान मिलना कितनी बड़ी बात हैं) । जब हम दोनों के नयन मिले तो वो मेरे जीवन का अनुपमये क्षण था, कार्यक्रम होने के बाद उन्होंने मुझे कल कहीं दूर चलने को कहा एकांत में, मैंने हामी भर दी । हम लोग दूसरे दिन अहले सुबह लखनऊ ट्रेन से निकल गए रास्ते में सामान्य बातें चलती रही स्टेशन पहुँचते ही हम दोनों चिड़ियाघर के लिए टैक्सी ली । चिड़ियाघर में प्रवेश करने के बाद उन्होंने सबसे पहले बधाई दी उसके बाद इन दो सालों में हम दोनों अपनी-अपनी बातें साझा करने लगें । जिस तरह से मैंने अचानक ही उनसे अपने दिल की बात कहीं थी, वैसे ही मस्ती के अंदाज़ में उन्होंने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया, मैं तो हक्का-बक्का ही रह गया मेरे कानों में बस बार-बार एक ही आवाज गूंज रही थी "मुझसे शादी करोगें"? जिसे पाने के लिए मैंने अपना सब कुछ इन दो साल तक झोंक दिया था वो अमानत सामने खड़ी थी, लेकिन मैं जिसके सहयोग से यहाँ तक पहुँच पाया वो मेरी शिक्षिका ना हो के मेरे मन की सखी जिसका मेरे जीवन में ना होना मछली के जीवन में जल का ना होना जैसे होगा ।  मैंने गंभीर होते हुए मैम को कहा मेरे ठहरे हुए जीवन को जिसने एक दिशा दी उसका वरन मैं तो नहीं कर सकता लेकिन मेरा दिल आज भी आपको उतना ही प्यार करता हैं जितना की कल तक, आप यदि मुझे अपना सकती हो तो मैं अपने आपको नहीं रोकूँगा आपका होने से । उनके आँखों से आश्रु बहने लगे और वो मेरे सीने से लगा गई और रोते हुए बोलने लगी यदि उस दिन मैंने तुम्हारे जुनून जो कि गलत था, के लिए शर्त नहीं रखती तो शायद तुम अपनी शक्ति को कभी समझ ना पाते, मेरे चेहरे पर शून्य भाव में था को मैम ने महसूस करते हुए कुछ क्षण बाद अपने आपको मेरे से अलग किया और कहा मुझे तुम पर गर्व हैं कि तुम जैसा इंसान मुझे प्यार करता हैं । आज के और पुराने शशि में अंतर साफ़ झलक रहा हैं मैं तो सदैव की तुम्हारी ऋणि हो गई जैसे सुखी धरती बरसात की । लेकिन हर रिश्ते की अपनी एक गरिमा हैं और उस गरिमा को तोड़ने का की तब जरुरत होती हैं जब उसके पीछे स्वार्थ छिपी हों और हमारे रिश्ते में अब वो बात कहा । जाते-जाते बस ये कह गई, हमारा ये रिश्ता हर बंधन से मुक्त हैं इसलिए किसी बंधन में बंधना इस रिश्ते को ऐसे बंधन की जरुरत नहीं बस मुझे अपने दुआओं में याद रखना और बातों का सिलसिला कभी थमने ना पाये बस इतना सा ख्याल रखना..........

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- २/११/२०१६
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