Friday, 14 October 2016

"रक्त की जुबानी"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"रक्त की जुबानी"~~~

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प्रणेश की अहले सुबह आँखें खुली नहीं थी कि पता नहीं कौन जोर-जोर से दरवाजा खट-खटा रहा था, आँखें खोलते नहीं खुल रही थी । जैसे-तैसे उसने दरवाजा खोला तो तरवेज को सामने पाया । बिना कुछ कहे वह अंदर सरपट दौड़े चला आया और बिना पूछे ।

हड़बड़ाहट में अपनी बात बोलने लगा कि मकान मालिक की पत्नी रामजानकी अस्पताल के आइ.सी.यू में भर्ती हैं । अभी तक ४ बोतल खून चढ़ चूका हैं डाक्टर अब भी ३ बोतल की सख्त जरूरत बता रहे हैं क्या तुम खून दे सकते हो । मैं प्रणेश का रूमि था, मैं भी वही था मैंने तपाक से पूछ डाला प्रणेश का खून तो हिन्दू वाला हैं क्या यहाँ के धर्म के नाम पर कट्टरता फ़ैलाने वाले नेताओ को इससे कोई परेशानी नहीं होगी, तो वो कुछ बोल नहीं पाया ।


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प्रणेश एक अच्छे दिल वाला इंसान था वह खून देने को तैयार हो गया वो भी तब जबकि वह कल व्रत में था, और उससे भी बड़ी बात ४ दिन बाद उसके सेमेस्टर एग्जाम शुरू होने को थे । प्रणेश मेरा रूमि होने के साथ-साथ एक अच्छा दोस्त भी था, मैंने उसे मना भी किया कि ये पागलपनती हैं एग्जाम सर पर हैं और तुम को इस बात कि फिक्र ही नहीं । उसने बस मुस्कुरा दिया और अस्पताल के लिए निकल पड़ा, शायद ये मानवता के लिए जरूरी था ।

प्रणेश का खून, मकान मालिक की पत्नी से मिल गया डॉ अपने का
में ये और बिना कोई देरी किये डॉक्टर ने खून चढाना शुरू कर दिया । खून चढते ही मकान मालिक की पत्नी की हालत में सुधार होने लगा और अब वह पहले से बेहतर महसूस कर रही थी । लेकिन खून चढ जाने के बाद भी प्रणेश से कोई उसका हाल-चाल पूछने नहीं आया, लेकिन इससे वह तनिक भी दुखी नहीं था अपितु वो खुश था कि उसने अपना कर्म किया हैं 

उसका ये मत था कि खून दान में दिया जाता हैं और वो जिसे दिया जाता उसका रोम-२ उसके लिए कृतज्ञता का आभास कराता हैं । हफ्ते दिन बाद पता चला मकान मालिक की पत्नी के हालत में तेजी से सुधार हो रहा था, अब वह चलने भी लगी थी इधर प्रणेश के एग्जाम भी अच्छे हो रहे थे । खुश था वह अपने जीवन से, बस यहाँ की धार्मिक कट्टरता से परेशान था ।


यह शहर उसे हर वक्त परेशान करता था, इस शहर में कब क्या हो जाए किसी को कोई खबर नहीं होती । यहाँ हर कोई एक-दूसरे धर्म के खिलाफ खून बहाने को तैयार हैं लेकिन अपनों के लिए किसी के पास खून ही नहीं था जिस्म में । लहू "जात-पात, पंथ" नहीं देखता उसे तो बस अपने समूह का साथ मिलना चाहिए, समय पर साथ मिल जाये तो मुरदे में जान ला दें । लेकिन वाह रे भगवान तेरे ही बनाये लोग तेरे नाम पर एक-दूसरे के खून के प्यासे । हे प्रभु ! तूने कैसी दूनिया बनायी हैं, यहाँ खून की एहिमियत लोगों को तब तक समझ में नहीं आती जब तक किसी अपने को लहू की जरूरत ना हो ।


#HINDI #SHORT #STORY


#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- ०७/०६/२०१६
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