Sunday, 30 October 2016

"दीपोदय"

लघु कथा सं-६
शीर्षक-"दीपोदय"~~~

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कुछ दिनों से कक्षा में सौम्य का मन ना लगना श्री अखिलेंद्र को परेशान कर रहा था, क्योंकि विज्ञान में वह इस बार फेल हो गया था जबकि विज्ञान उसका पसंदीदा और मजबूत विषय जो था । अपना लेक्चर समाप्त होने के बाद अखिलेंद्र सर ने उसे घर जाने से पहले उनसे मिलने को बोल चले गए । सौम्य जो कि पढ़ने में होशियार के साथ-साथ व्यवहार-कुशल भी था, यही बात उसे दूसरे बच्चों से अलग करती थी ।

कक्षा में वो यही सोच रहा था कि सर ने आज क्यों बुलाया हैं, आज तक तो कभी सर ने नहीं बुलाया था फिर आज क्यों, कहीं मेरे से कोई बड़ी गलती तो नहीं हो गयी । पूरे दिन इसी बारे में सोचते हुए किसी तरह उसने अपने सारे कक्षाएँ पूरी करने के बाद व्याकुलता और डर के मिश्रित भाव के साथ वो धीरे-धीरे कदमों से अखिलेंद्र बाबू के केबिन तक पहुँचा और अंदर आने के लिए जैसे ही आवाज लगाई उसे अखिलेंद्र बाबू ने अंदर आ जाने को बोला जैसे अखिलेंद्र बाबू उसका  ही बेसब्री से इंतजार कर रहे हो ।

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इधर-उधर की बातों के साथ  अखिलेंद्र बाबू ने उसके परेशानी के बारे में पूछना शुरू किया । सबसे पहले उन्होंने उससे कहा आजकल तुम्हारा पढ़ने में मन नहीं लग रहा क्या जो मेरे विषय में तुम्हारे इतने कम नंबर आयें और तुम्हारा कक्षा में भी तुम्हारा ध्यान कहीं और लगा रहता हैं नहीं, कोई परेशानी हो तो बताओं । झिझकते हुए सौम्य ने अपनी बात शुरू कि सर माँ के अलावा मेरा कोई इस दूनिया में अपना नहीं, माँ सिलाई करके मेरी परवरिश कर रही हैं । लेकिन वो अब बीमार रहती हैं, जिसके कारण घर का खर्चा भी नहीं निकल पाता हो सकता हैं मुझे अगले महीने स्कूल से भी निकाल दिया जाए ।

उसके माँ की तबियत खराब और घर की माली हालत पर अफसोस करने के बाद

सर : दीवाली में कितने दिन रह गये हैं ?
सौम्य : चार दिन ।
सर : इस बार दीया जलाओं क्या?
सौम्य : बिल्कुल सर ।
सरः कोई कारण है या बस ऐसे ही जलाते हैं दीया?
सौम्य : सर ज्यादा कुछ तो नहीं पता माँ ने बताया था कि १४ के वनवास से प्रभु राम के लौटने की खुशी में दीपावली मनायी जाती हैं ।

सर : बिल्कुल सही, अब मैं तुम्हें दीया के बारे में बताता हूँ । दीया रूपी हमारे शरीर को अपने अंदर के बाती रूपी सपने को साकार करने हेतु अपने परिश्रम से अर्जित ज्ञान रूपी घी का उपयोग अपने अंदर के अंधियारे रूपी जीवन को प्रकाशमय कर पाओगे तभी अपने अंदर के डर रूपी कीड़े-मकोड़े का अंत कर पाओगें ।

यहीं समझाने के लिए तुम्हें बुलाया था कि अपने जीवन को दीया की तरह बनाने के लिए प्रयत्नशील रहो जिस तरह से दीया के प्रकाश से आस-पड़ोस की जगह भी प्रकाशमान होती हैं ठीक उसी तरह तुम्हारे तेज से आस-पड़ोस के बच्चों में कुछ कर गुजरने की इच्छा जगेगी । तुम चाहो तो दीपावली बाद शाम पाँच बजे से १ से ६ तक के बच्चों को पढ़ाने आ सकते हो जिससे तुम्हारे घर का खर्च भी निकल जायेगा और माँ का बोझ भी कम हो जायेगा, साथ ही तुम्हारा बेस भी मजबूत हो जायेगा संग ही तुम्हारे व्यक्तित्व में भी निखार आयेगा । ये सब सुनने के बाद सौम्य के आँखों में आँसू आ गये, ये देखकर अखिलेंद्र बाबू डर गये । उन्होंने जब पूछा मेरी बातों ने दुख पहुँचाया क्या? इतना अखिलेंद्र बाबू के कहते ही सौम्य उनसे लिपट कर रोने लगा, उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और पानी पिलाया । फिर जब सौम्य शांत हुआ तो सौम्य ने कहा मैं अब कभी डरूगा नहीं बल्कि अब हर परिस्थिति का सामना करूँगा, क्योंकि आपने मेरी जीवन के सोचने के दृष्टिकोण को ही बदल दिया । आज आप ना होते तो हो सकता था मैं कल से कहीं मजदूरी कर रहा होता । ये कहते हुए वो फिर भाव-विहल हो गया, अचानक उसे माँ की याद आयी । उसने सर से बोला, माँ इंतजार कर रही होगी अब मैं चलता हूँ सर, कल से सर आपको आपका नया सौम्य मिलेगा जो निडर और साहसी के साथ-साथ घबराना भूल कर संकट में हँसना जानता होगा ।

आज बहुत दिन बाद अखिलेंद्र बाबू मंद-मंद मुस्कुरा रहें थे और उसे सौम्य को जाते हुए निहार भी रहे थे , क्योंकि आज उन्होंने अपने एक दीया को बुझने से जो बचा लिया था । 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-३०/१०/२०१६ (शुभ दीपावली)
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