Sunday, 30 October 2016

"प्रेमल मन"

लघु कथा सं-५
शीर्षक-"प्रेमल मन"~~~

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स्टेशन पहुँचते ही दौड़ा-दौड़ा पूछताछ केंद्र पहुँचा तो समय सारणी में अपने ट्रेन के स्थिति जानने के लिए उत्सुक था, लेकिन ये क्या ट्रेन लगभग ढाई घंटे देरी से पहुँचने की संभावना बता रहा था । रात का सफर वैसे भी बोझिल होती और ऊपर से ये इंतजार की घड़ी । समय काटे नहीं कट रही थी और कुछ सुझ भी नहीं रहा था की क्या करू तो झपकी भी आ रही थी लेकिन अपने आपको जगाये रखना जरूरी था और इसलिए प्लेटफार्म पर घूम रहा था ।

मैं बार-बार ट्रेन की स्थिति जानने के लिए व्याकुल था लेकिन ट्रेन अब तीन घंटे देरी से आने की संभावना की उद्घोषणाहोने लगी । ट्रेन लगभग तीन घंटे की देरी से आ चूँकि थी । सांस में जान आयी क्योंकि घर जाने की बात जो घर से दूर रहते हैं वहीं मेरी बेचैनी समझ सकता हैं ।

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ट्रेन लगभग तीन बजे स्टेशन पहुँची, अपने कोच में चढ़ने की बेसब्री मुझे व्यग्र कर रही थी कि कब ट्रेन रूके और मैं चढ़ जाऊ । कुछ पल में ट्रेन रूकी और मैं अपने कोच में चढ़ गया, रात का समय होने के कारण मुझे अपनी सीट ढूँढने में थोड़ी परेशानी भी हुई लेकिन चंद मिनट में जैसे ही अपने सीट पर था और इतनी तेज नींद आ रही थी कि सीट पर पहुँचते ही मैं लूढक गया, मुझे कब निद्र देव ने कब अपनी गोद में सुला लिया पता ही नहीं चला ।

पता नहीं कितने बजे थे लेकिन लोगों के आवाज ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया था । इतना शोर-गूल होने के कारण मुझे झल्ला कर उठना ही पड़ा । उठकर खिड़की से बाहर देखा तो कोई बड़ा देखने में लग रहा था, पूछने पर लखनऊ स्टेशन पहुँचने की सूचना मिली इसका मतलब ट्रेन अब और लेट हो गई थी ।

मेरी सीट ऊपर थी और जिस कमपारटमेंट में मैं था वहाँ बैठे लोगों के बात करने के तरीके से सभी एक ही परिवार के लग रहे थे शायद किसी जगह से घूम कर लौट रहे थे । उनके साथ उनका जत्था साथ चल रहा था जो कि इसी कोच में लेकिन कुछ दूरी पर था । ये बाते उनलोगों के बात करने से पता लग रही थी । ट्रेन हर छोटे-बड़े स्टेशन पर रूकने के कारण और लेट ही होती जा रही थी, लखनऊ आते-आते लगभग पाँच घंटे लेट हो गयी थी । ट्रेन लखनऊ से निकल चूँकि थी, इसी बीच मैं भी फ्रेश होने के लिए चला गया । फ्रेश होने के बाद मैं भी कुछ देर नीचे वाली सीट पर ही बैठने की सोच रहा था कि मेरी नजर खिड़की की तरफ चली गई । खिड़की के बाहर हरा-भरा खेत-खलिहान लह-लहा रहे थे । तभी वहाँ बैठे हुए में किसी ने मेरा ध्यान भंग करते हुए मुझसे पूछा आप तो रात में चढ़े होंगे तो मैंने प्रति उत्तर में हाँ में सिर हिला दिया । फिर ट्रेन के लेट होने पर बात शुरू हुई । मेरे साथ बैठे सभी लोगों में से एक ही इंसान था जो कुछ नहीं बोल रहा था बस बाहर के दृश्य का आनंद ले रहा था बस कभी-कभी मुस्कुरा कर बाहर निहारने लगता । नींद पूरी ना होने के कारण मुझे नींद आ रही थी तो मैं सोने चला गया, कुछ देर सोने के बाद अचानक नींद में ही आँखें खुली तो....

क्रमशः

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-२८/१०/२०१६
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