Sunday, 16 October 2016

"स्वपनिल सच"

लघु कथा सं-४
शीर्षक-"स्वपनिल सच"~~~

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आॅफिस से मीटिंग के लिए निकला ही था कि सहसा ही एक अंजाने मोबाइल नंबर से काॅल आ गई, उसकी आवाज पहचानी सी लग रही थी मगर उसका नाम याद नहीं आ रहा था । उसने कहा सर मैं आपकी छात्रा नरगिस, मेरा सलेक्शन यू.पी-पी.सी.एस में हुआ और शिवा का बैंक में और सब भी प्राइवेट कंपनी में अच्छे पोस्ट पर कार्य कर रहें हैं । मैंने पूछा मेरा नंबर कहा से मिला एस.डी.यो मैडम, तो उसने बोला सोशल साइट से सर । मैंने कहा चलो अच्छा हैं कम से कम सोशल साइट से कुछ का भला तो होता हैं आज अपने विद्यार्थीयों के बारे में अच्छा सुनने को तो मिला । मैंने उसे फिर शाम में फोन करने की बात बोल कर फोन काट दिया और कार में बैठ गया, और ड्राइवर को होटल ड्रीम स्पार्क चलने को बोल मैं सहसा ही पंद्रह (15) साल पहले कि दूनिया में चला गया ।


क्लास से निकला ही था कि बालकनी से प्राकृति की गोद नन्हें-नन्हें बच्चों की चह-चहाहट सुनाई पड़ी । कौतूहाल भरी नजर से जब पूरे नजारा को देखा तो मन में उमंगे उमड़ने लगी । खुले आकाश में कुछ बच्चों की टोली को जो दो लड़कियाँ पढ़ा रही थी, देखने में अच्छे घरों की लग रही थी । मैं उनके नजदीक पहुँचा तो उनके सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य कि प्रशंसा करने से अपने आप को रोक ना सका । 

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जब उनसे उनके बारे में पूछा तो थोड़ी हिचकिचाहट के बाद दोनों ने अपना नाम बताया, एक का नाम शताक्षी बी.टेक (तृतीय वर्ग) तथा दूसरे का नाम निदा बी.एसी (द्वितीय वर्ष) में पढ़ रही थी । उनके मन में बच्चों को पढ़ाने की बात में कैसे आइ मैंने जैसे ही पूछा तो उन दोनों ने बताना शुरू किया- लंच टाईम में हम दोनों छात्रावास के लिए निकले ही थे कि इन बच्चों की गेंद निदा को लग गयी तो सभी बच्चें माफी माँगने दौड़े चले आये । चोट मामूली थी, उन लोगों को पास बुलाया और प्यार से पूछा तुम लोगों हर समय बस खेलते ही, पढ़ने का मन नहीं होता । तो उनमें से सबसे छोटा जिसका नाम दारून था ने कहा पढना तो चाहता हूँ मगर कोई पढाने वाला नहीं हैं, तो निदा ने पूछा हम दोनों यदि आज सए पढाना शुरू करें शाम को तो पढ़ोगें सब ने हाँ में सिर हिला दिया । उसके बाद बच्चों के पढ़ाने का स्थल, बोर्ड और बच्चों के बैठने की व्यवस्था की इसमें उतनी परेशानी नहीं हुईं । धीरे-धीरे दूसरे बच्चे भी देखा-देखी पढ़ने आने लगे जो से बढ़ता ही जा रहा हैं । अब तो रोज का रूटिन हो गया हैं क्लास खत्म होने के तुरंत बाद हम दोनों बच्चों को पढ़ाते हैं । बच्चें इतने जिज्ञासु हैं कि खेल की जगह पढ़ाई को तरजीह दे रहे हैं और ये बाते उन बच्चों के आँखों से साफ झलक रहा था । जिन बच्चों को वो लोग पढ़ाती थी वो कोई और नहीं बल्कि जिन्होंने अपने खून-पसीने से हमारे कॉलेज को बनाया था वो उन मजदूरों के बच्चे थें । इतना सब कुछ सुनने के बाद कौन भला अपने आपको रोक सकता हैं मैं भी नहीं रोक सका, उनसे मैंने मुहिम से जुड़ने की इच्छा जाहिर कर दी, तो उन्होंने मेरी इच्छा का आदर करते हुए सहर्ष इस बात को स्वीकार कर लिया । अब जिस-जिस दिन मेरी क्लास होती मैं उस दिन पढ़ाता और बाकी दिन वो दोनों । धीरे-धीरे और भी बच्चें इस मुहिम से जुड़ते गये, अब बच्चें भी पहले से बढ़ गये और पढ़ाने वाले भी लेकिन एक चीज नहीं बदली वो थी उन दोनों लड़कियों की ज़िम्मेवारी, क्लास शुरू होने से लेकर अंत तक उन्हें रहना होता था जो कि उनहें थका देती थी । ये बाते मैं समझ रहा था और इसलिए जिस दिन मैं पढ़ाने पहुँचता उनको निश्चिंत होकर छात्रावास जाने को कहता, अब वो मेरे पढ़ाने के दिन मन होता तो रूकती नहीं तो छात्रावास । वैसे भी मुझे बच्चों को पढ़ाना अच्छा लगने लगा था, समय का पता ही नहीं चलता था मन होता था जितना हो सके उनके साथ जी लू ये पल । अब हमारी चिंता इस बात को लेकर थी कैसे इन बच्चों का नामांकन किसी विद्यालय हो जिससे ये आगे की पढ़ाई जारी रख सके । अचानक से एक दिन दैनिक समाचार पत्र के पत्रकार इंटरव्यू लेने आ गये जब शताक्षी और निदा पढ़ा रही थी । अगले ही दिन हर जगह इनके ही चरचे थे, ये बाते हमारे कॉलेज के रजिस्ट्रार सर ने भी सुनी तो खुश होकर उन्होंने नये सत्र शुरू होते ही बच्चों का किसी अच्छे विद्यालय में नामांकन करवाने का वादा किया । अब हमारा ग्रुप पहले से ज्यादा जी-जान से लग गया, सत्र शुरूआत होते ही रजिस्ट्रार सर ने उनबच्चों का नामांकन करवा दिया, अब हमारी ज़िम्मेवारी और बढ़ गई थी । क्लास टेस्ट हमारे सभी बच्चों ने अच्छा किया सिवाय शिवा के जो कि पढ़ने में तो होशियार था मगर बड़ा वाला ड्रामेबाज था । आने वाले परीक्षा के लिए हमलोगों ने अभी से कमर कस ली थी इस बार हर वर्ग में अपने बच्चे १-५ में लाने हैं । परीक्षा शुरू हुए इस बार बच्चों के पेपर पहले से बढ़िया जा रहें थे । परीक्षाफल आ गई, इस बार नरगिस और शिवा ने अपने-अपने वर्ग में प्रथम, सलीम और मुनी अपने-अपने वर्ग में क्रमशः द्वितीय एवम् तृतीय तथा और बच्चें भी अच्छे नंबरो से उत्तीर्ण हुए हम सब बहुत खुश थे । हमारे भी कोर्स पूरे हो गये थे अब हमारे जाने का समय आ चुका था ना चाहते हुए भी हमें जाना पड़ा । हमलोग अपने कैरियर बनाने में लग गये लेकिन कभी-कभी उन बच्चों से बात हो जाती थी । वो लोग दिन प्रतिदिन पहले से बेहतर होते गए ।

आज पंद्रह साल बाद, शताक्षी और निदा के द्वारा लगाये गए छोटे पौधे ने फल देना शुरू कर दिया था, ये हमारे सपने को साकार होने जैसा था । आज उन सब बच्चों के साथ हम लोगों द्वारा गाया जाने वाला गीत "हम होंगे कामयाब एक दिन" सफल होता प्रतीत हो रहा हैं ।

हम होंगे कामयाब एक दिन,
होगी शिक्षा सब के पास एक दिन ।


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#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-१३/१०/२०१६
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