Friday, 14 October 2016

"स्टेशन तक"

लघु कथा सं-१
शीर्षक-"स्टेशन तक"~~~

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बात पुरानी हैं, ऑफिस के काम से पटना जाना हुआ था । पूरे दिन दौड़-भाग के बाद शाम को अन्न नसीब हुआ वो भी सिर्फ "समोसे"। रात को बिस्तर पर जाने के बाद कब आँख लग गयी पता ही ना चला । लोगों से जैसा पटना के बारे में सुना था उससे कुछ हटके था पाटलिपुत्र । सुबह उठते ही नाश्ते में लिट्टी-चौखा खाने को मिला, मुँह में पानी आ गया "जबरदस्त" चटपटा । दोपहर होते-होते ऑफिस का काम निपट चुका था, रात को मेरी ट्रेन होने के कारण मुझे कोई जल्दी नहीं थी । पैदल ही होटल के लिए निकल पड़ा इससे पटना को दिल के करीब से देखने का मौका भी मिला गया था । मैं गाँधी मैदान होते हुए होटल के लिए चल पड़ा जो कि स्टेशन के करीब ही था ।

पटना के ऐतिहासिक चीजों को देखकर मैं इतना अभिभूत था कि कब मैं हम-उम्रों टोली के बीच जा पहुँचा पता ही ना चला । इस बीच उसी टोली में दो आँखें कब अपनी हों गई पता ही ना चला, सब कुछ इतनी जल्दी घटित हो रहा था कि कब एक अनजान सा चेहरा अपना हो गया, समझ में ही नहीं आया । वो मेरे करीब थी और उसने पूछा आपको तो अपने ग्रुप में कभी नहीं देखा, मैंने हँसते हुए कहा तुमसे ही मिलने आया हूँ मजाक में  उसके साथ हल्की-फुल्की बातें करते हुए कब मेरी मंजिल आ चुकी थी पता ही नहीं चला, उसने अपनी हल्की मुस्कान के साथ अपना मोबाइल नंबर देते हुए मुझसे विदा लिया ।

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शाम हो चूँकि थी, मुझे होटल से स्टेशन को निकलना पड़ा, थके होने के कारण कब मैं ट्रेन में सो गया।  दिल्ली पहुँच कर मैं अपने लाइफ में बिजी हो गया, धीरे-2 समय बितता गया अचानक छुट्टी के दिन डायरी से एक पुरजी निकली अचानक ध्यान आया तो मैंने फोन घुमा दिया रिंग होने लगी, उधर से प्यारी सी आवाज आई -हौलो, कौन? मेरे मुँह से बस हल्की सी आवाज निकली "आपका अनजान फ्रेंड" । उसने बोला पहचाना नहीं , मैंने बोला भीड़ में जिसे "आपने अपना समझा" । उसने बोला ओह मैय गाॅड आप इतने दिन बाद कैसे हैं क्या हो रहा हैं और सबसे महत्वपूर्ण सवाल आपका शुभ नाम? बहुत देर तक देर बातें होती रही और उस दिन से हमारी रोज बातें होने लगी और  धीरे-2 हम अच्छे दोस्त बनें, एक-दूसरे से अपने प्राबलम शेयर करते, उसे सुलझाते ।

आज भी 20 साल बाद भी हम दोनों अच्छे दोस्त हैं,  पंद्रह साल पहले मेरी शादी हो गई एक प्यारी लड़की से जिसके लिये मैं ही उसकी दूनिया हूँ और मेरे लिये वो । जिस कॉलेज में वो पढाती थी, आज वो उस कॉलेज की प्रिंसिपल हैं और मैं सफल उद्योगपति । वो मेरे कंपनी की निर्णायक मंडल की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य हैं आज तक उसने जो भी सलाह कंपनी को दी उसने कंपनी को ऊँचाई को छूने के और करीब पहुँचाया ।

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#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- ०४/०४/२०१६
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