Sunday, 30 October 2016

"दीपोदय"

लघु कथा सं-६
शीर्षक-"दीपोदय"~~~

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कुछ दिनों से कक्षा में सौम्य का मन ना लगना श्री अखिलेंद्र को परेशान कर रहा था, क्योंकि विज्ञान में वह इस बार फेल हो गया था जबकि विज्ञान उसका पसंदीदा और मजबूत विषय जो था । अपना लेक्चर समाप्त होने के बाद अखिलेंद्र सर ने उसे घर जाने से पहले उनसे मिलने को बोल चले गए । सौम्य जो कि पढ़ने में होशियार के साथ-साथ व्यवहार-कुशल भी था, यही बात उसे दूसरे बच्चों से अलग करती थी ।

कक्षा में वो यही सोच रहा था कि सर ने आज क्यों बुलाया हैं, आज तक तो कभी सर ने नहीं बुलाया था फिर आज क्यों, कहीं मेरे से कोई बड़ी गलती तो नहीं हो गयी । पूरे दिन इसी बारे में सोचते हुए किसी तरह उसने अपने सारे कक्षाएँ पूरी करने के बाद व्याकुलता और डर के मिश्रित भाव के साथ वो धीरे-धीरे कदमों से अखिलेंद्र बाबू के केबिन तक पहुँचा और अंदर आने के लिए जैसे ही आवाज लगाई उसे अखिलेंद्र बाबू ने अंदर आ जाने को बोला जैसे अखिलेंद्र बाबू उसका  ही बेसब्री से इंतजार कर रहे हो ।

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इधर-उधर की बातों के साथ  अखिलेंद्र बाबू ने उसके परेशानी के बारे में पूछना शुरू किया । सबसे पहले उन्होंने उससे कहा आजकल तुम्हारा पढ़ने में मन नहीं लग रहा क्या जो मेरे विषय में तुम्हारे इतने कम नंबर आयें और तुम्हारा कक्षा में भी तुम्हारा ध्यान कहीं और लगा रहता हैं नहीं, कोई परेशानी हो तो बताओं । झिझकते हुए सौम्य ने अपनी बात शुरू कि सर माँ के अलावा मेरा कोई इस दूनिया में अपना नहीं, माँ सिलाई करके मेरी परवरिश कर रही हैं । लेकिन वो अब बीमार रहती हैं, जिसके कारण घर का खर्चा भी नहीं निकल पाता हो सकता हैं मुझे अगले महीने स्कूल से भी निकाल दिया जाए ।

उसके माँ की तबियत खराब और घर की माली हालत पर अफसोस करने के बाद

सर : दीवाली में कितने दिन रह गये हैं ?
सौम्य : चार दिन ।
सर : इस बार दीया जलाओं क्या?
सौम्य : बिल्कुल सर ।
सरः कोई कारण है या बस ऐसे ही जलाते हैं दीया?
सौम्य : सर ज्यादा कुछ तो नहीं पता माँ ने बताया था कि १४ के वनवास से प्रभु राम के लौटने की खुशी में दीपावली मनायी जाती हैं ।

सर : बिल्कुल सही, अब मैं तुम्हें दीया के बारे में बताता हूँ । दीया रूपी हमारे शरीर को अपने अंदर के बाती रूपी सपने को साकार करने हेतु अपने परिश्रम से अर्जित ज्ञान रूपी घी का उपयोग अपने अंदर के अंधियारे रूपी जीवन को प्रकाशमय कर पाओगे तभी अपने अंदर के डर रूपी कीड़े-मकोड़े का अंत कर पाओगें ।

यहीं समझाने के लिए तुम्हें बुलाया था कि अपने जीवन को दीया की तरह बनाने के लिए प्रयत्नशील रहो जिस तरह से दीया के प्रकाश से आस-पड़ोस की जगह भी प्रकाशमान होती हैं ठीक उसी तरह तुम्हारे तेज से आस-पड़ोस के बच्चों में कुछ कर गुजरने की इच्छा जगेगी । तुम चाहो तो दीपावली बाद शाम पाँच बजे से १ से ६ तक के बच्चों को पढ़ाने आ सकते हो जिससे तुम्हारे घर का खर्च भी निकल जायेगा और माँ का बोझ भी कम हो जायेगा, साथ ही तुम्हारा बेस भी मजबूत हो जायेगा संग ही तुम्हारे व्यक्तित्व में भी निखार आयेगा । ये सब सुनने के बाद सौम्य के आँखों में आँसू आ गये, ये देखकर अखिलेंद्र बाबू डर गये । उन्होंने जब पूछा मेरी बातों ने दुख पहुँचाया क्या? इतना अखिलेंद्र बाबू के कहते ही सौम्य उनसे लिपट कर रोने लगा, उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और पानी पिलाया । फिर जब सौम्य शांत हुआ तो सौम्य ने कहा मैं अब कभी डरूगा नहीं बल्कि अब हर परिस्थिति का सामना करूँगा, क्योंकि आपने मेरी जीवन के सोचने के दृष्टिकोण को ही बदल दिया । आज आप ना होते तो हो सकता था मैं कल से कहीं मजदूरी कर रहा होता । ये कहते हुए वो फिर भाव-विहल हो गया, अचानक उसे माँ की याद आयी । उसने सर से बोला, माँ इंतजार कर रही होगी अब मैं चलता हूँ सर, कल से सर आपको आपका नया सौम्य मिलेगा जो निडर और साहसी के साथ-साथ घबराना भूल कर संकट में हँसना जानता होगा ।

आज बहुत दिन बाद अखिलेंद्र बाबू मंद-मंद मुस्कुरा रहें थे और उसे सौम्य को जाते हुए निहार भी रहे थे , क्योंकि आज उन्होंने अपने एक दीया को बुझने से जो बचा लिया था । 

#Sandesh2Soldiers  #Dedicated_to_Soliders

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-३०/१०/२०१६ (शुभ दीपावली)
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"प्रेमल मन"

लघु कथा सं-५
शीर्षक-"प्रेमल मन"~~~

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स्टेशन पहुँचते ही दौड़ा-दौड़ा पूछताछ केंद्र पहुँचा तो समय सारणी में अपने ट्रेन के स्थिति जानने के लिए उत्सुक था, लेकिन ये क्या ट्रेन लगभग ढाई घंटे देरी से पहुँचने की संभावना बता रहा था । रात का सफर वैसे भी बोझिल होती और ऊपर से ये इंतजार की घड़ी । समय काटे नहीं कट रही थी और कुछ सुझ भी नहीं रहा था की क्या करू तो झपकी भी आ रही थी लेकिन अपने आपको जगाये रखना जरूरी था और इसलिए प्लेटफार्म पर घूम रहा था ।

मैं बार-बार ट्रेन की स्थिति जानने के लिए व्याकुल था लेकिन ट्रेन अब तीन घंटे देरी से आने की संभावना की उद्घोषणाहोने लगी । ट्रेन लगभग तीन घंटे की देरी से आ चूँकि थी । सांस में जान आयी क्योंकि घर जाने की बात जो घर से दूर रहते हैं वहीं मेरी बेचैनी समझ सकता हैं ।

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ट्रेन लगभग तीन बजे स्टेशन पहुँची, अपने कोच में चढ़ने की बेसब्री मुझे व्यग्र कर रही थी कि कब ट्रेन रूके और मैं चढ़ जाऊ । कुछ पल में ट्रेन रूकी और मैं अपने कोच में चढ़ गया, रात का समय होने के कारण मुझे अपनी सीट ढूँढने में थोड़ी परेशानी भी हुई लेकिन चंद मिनट में जैसे ही अपने सीट पर था और इतनी तेज नींद आ रही थी कि सीट पर पहुँचते ही मैं लूढक गया, मुझे कब निद्र देव ने कब अपनी गोद में सुला लिया पता ही नहीं चला ।

पता नहीं कितने बजे थे लेकिन लोगों के आवाज ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया था । इतना शोर-गूल होने के कारण मुझे झल्ला कर उठना ही पड़ा । उठकर खिड़की से बाहर देखा तो कोई बड़ा देखने में लग रहा था, पूछने पर लखनऊ स्टेशन पहुँचने की सूचना मिली इसका मतलब ट्रेन अब और लेट हो गई थी ।

मेरी सीट ऊपर थी और जिस कमपारटमेंट में मैं था वहाँ बैठे लोगों के बात करने के तरीके से सभी एक ही परिवार के लग रहे थे शायद किसी जगह से घूम कर लौट रहे थे । उनके साथ उनका जत्था साथ चल रहा था जो कि इसी कोच में लेकिन कुछ दूरी पर था । ये बाते उनलोगों के बात करने से पता लग रही थी । ट्रेन हर छोटे-बड़े स्टेशन पर रूकने के कारण और लेट ही होती जा रही थी, लखनऊ आते-आते लगभग पाँच घंटे लेट हो गयी थी । ट्रेन लखनऊ से निकल चूँकि थी, इसी बीच मैं भी फ्रेश होने के लिए चला गया । फ्रेश होने के बाद मैं भी कुछ देर नीचे वाली सीट पर ही बैठने की सोच रहा था कि मेरी नजर खिड़की की तरफ चली गई । खिड़की के बाहर हरा-भरा खेत-खलिहान लह-लहा रहे थे । तभी वहाँ बैठे हुए में किसी ने मेरा ध्यान भंग करते हुए मुझसे पूछा आप तो रात में चढ़े होंगे तो मैंने प्रति उत्तर में हाँ में सिर हिला दिया । फिर ट्रेन के लेट होने पर बात शुरू हुई । मेरे साथ बैठे सभी लोगों में से एक ही इंसान था जो कुछ नहीं बोल रहा था बस बाहर के दृश्य का आनंद ले रहा था बस कभी-कभी मुस्कुरा कर बाहर निहारने लगता । नींद पूरी ना होने के कारण मुझे नींद आ रही थी तो मैं सोने चला गया, कुछ देर सोने के बाद अचानक नींद में ही आँखें खुली तो....

क्रमशः

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-२८/१०/२०१६
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Sunday, 16 October 2016

"स्वपनिल सच"

लघु कथा सं-४
शीर्षक-"स्वपनिल सच"~~~

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आॅफिस से मीटिंग के लिए निकला ही था कि सहसा ही एक अंजाने मोबाइल नंबर से काॅल आ गई, उसकी आवाज पहचानी सी लग रही थी मगर उसका नाम याद नहीं आ रहा था । उसने कहा सर मैं आपकी छात्रा नरगिस, मेरा सलेक्शन यू.पी-पी.सी.एस में हुआ और शिवा का बैंक में और सब भी प्राइवेट कंपनी में अच्छे पोस्ट पर कार्य कर रहें हैं । मैंने पूछा मेरा नंबर कहा से मिला एस.डी.यो मैडम, तो उसने बोला सोशल साइट से सर । मैंने कहा चलो अच्छा हैं कम से कम सोशल साइट से कुछ का भला तो होता हैं आज अपने विद्यार्थीयों के बारे में अच्छा सुनने को तो मिला । मैंने उसे फिर शाम में फोन करने की बात बोल कर फोन काट दिया और कार में बैठ गया, और ड्राइवर को होटल ड्रीम स्पार्क चलने को बोल मैं सहसा ही पंद्रह (15) साल पहले कि दूनिया में चला गया ।


क्लास से निकला ही था कि बालकनी से प्राकृति की गोद नन्हें-नन्हें बच्चों की चह-चहाहट सुनाई पड़ी । कौतूहाल भरी नजर से जब पूरे नजारा को देखा तो मन में उमंगे उमड़ने लगी । खुले आकाश में कुछ बच्चों की टोली को जो दो लड़कियाँ पढ़ा रही थी, देखने में अच्छे घरों की लग रही थी । मैं उनके नजदीक पहुँचा तो उनके सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य कि प्रशंसा करने से अपने आप को रोक ना सका । 

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जब उनसे उनके बारे में पूछा तो थोड़ी हिचकिचाहट के बाद दोनों ने अपना नाम बताया, एक का नाम शताक्षी बी.टेक (तृतीय वर्ग) तथा दूसरे का नाम निदा बी.एसी (द्वितीय वर्ष) में पढ़ रही थी । उनके मन में बच्चों को पढ़ाने की बात में कैसे आइ मैंने जैसे ही पूछा तो उन दोनों ने बताना शुरू किया- लंच टाईम में हम दोनों छात्रावास के लिए निकले ही थे कि इन बच्चों की गेंद निदा को लग गयी तो सभी बच्चें माफी माँगने दौड़े चले आये । चोट मामूली थी, उन लोगों को पास बुलाया और प्यार से पूछा तुम लोगों हर समय बस खेलते ही, पढ़ने का मन नहीं होता । तो उनमें से सबसे छोटा जिसका नाम दारून था ने कहा पढना तो चाहता हूँ मगर कोई पढाने वाला नहीं हैं, तो निदा ने पूछा हम दोनों यदि आज सए पढाना शुरू करें शाम को तो पढ़ोगें सब ने हाँ में सिर हिला दिया । उसके बाद बच्चों के पढ़ाने का स्थल, बोर्ड और बच्चों के बैठने की व्यवस्था की इसमें उतनी परेशानी नहीं हुईं । धीरे-धीरे दूसरे बच्चे भी देखा-देखी पढ़ने आने लगे जो से बढ़ता ही जा रहा हैं । अब तो रोज का रूटिन हो गया हैं क्लास खत्म होने के तुरंत बाद हम दोनों बच्चों को पढ़ाते हैं । बच्चें इतने जिज्ञासु हैं कि खेल की जगह पढ़ाई को तरजीह दे रहे हैं और ये बाते उन बच्चों के आँखों से साफ झलक रहा था । जिन बच्चों को वो लोग पढ़ाती थी वो कोई और नहीं बल्कि जिन्होंने अपने खून-पसीने से हमारे कॉलेज को बनाया था वो उन मजदूरों के बच्चे थें । इतना सब कुछ सुनने के बाद कौन भला अपने आपको रोक सकता हैं मैं भी नहीं रोक सका, उनसे मैंने मुहिम से जुड़ने की इच्छा जाहिर कर दी, तो उन्होंने मेरी इच्छा का आदर करते हुए सहर्ष इस बात को स्वीकार कर लिया । अब जिस-जिस दिन मेरी क्लास होती मैं उस दिन पढ़ाता और बाकी दिन वो दोनों । धीरे-धीरे और भी बच्चें इस मुहिम से जुड़ते गये, अब बच्चें भी पहले से बढ़ गये और पढ़ाने वाले भी लेकिन एक चीज नहीं बदली वो थी उन दोनों लड़कियों की ज़िम्मेवारी, क्लास शुरू होने से लेकर अंत तक उन्हें रहना होता था जो कि उनहें थका देती थी । ये बाते मैं समझ रहा था और इसलिए जिस दिन मैं पढ़ाने पहुँचता उनको निश्चिंत होकर छात्रावास जाने को कहता, अब वो मेरे पढ़ाने के दिन मन होता तो रूकती नहीं तो छात्रावास । वैसे भी मुझे बच्चों को पढ़ाना अच्छा लगने लगा था, समय का पता ही नहीं चलता था मन होता था जितना हो सके उनके साथ जी लू ये पल । अब हमारी चिंता इस बात को लेकर थी कैसे इन बच्चों का नामांकन किसी विद्यालय हो जिससे ये आगे की पढ़ाई जारी रख सके । अचानक से एक दिन दैनिक समाचार पत्र के पत्रकार इंटरव्यू लेने आ गये जब शताक्षी और निदा पढ़ा रही थी । अगले ही दिन हर जगह इनके ही चरचे थे, ये बाते हमारे कॉलेज के रजिस्ट्रार सर ने भी सुनी तो खुश होकर उन्होंने नये सत्र शुरू होते ही बच्चों का किसी अच्छे विद्यालय में नामांकन करवाने का वादा किया । अब हमारा ग्रुप पहले से ज्यादा जी-जान से लग गया, सत्र शुरूआत होते ही रजिस्ट्रार सर ने उनबच्चों का नामांकन करवा दिया, अब हमारी ज़िम्मेवारी और बढ़ गई थी । क्लास टेस्ट हमारे सभी बच्चों ने अच्छा किया सिवाय शिवा के जो कि पढ़ने में तो होशियार था मगर बड़ा वाला ड्रामेबाज था । आने वाले परीक्षा के लिए हमलोगों ने अभी से कमर कस ली थी इस बार हर वर्ग में अपने बच्चे १-५ में लाने हैं । परीक्षा शुरू हुए इस बार बच्चों के पेपर पहले से बढ़िया जा रहें थे । परीक्षाफल आ गई, इस बार नरगिस और शिवा ने अपने-अपने वर्ग में प्रथम, सलीम और मुनी अपने-अपने वर्ग में क्रमशः द्वितीय एवम् तृतीय तथा और बच्चें भी अच्छे नंबरो से उत्तीर्ण हुए हम सब बहुत खुश थे । हमारे भी कोर्स पूरे हो गये थे अब हमारे जाने का समय आ चुका था ना चाहते हुए भी हमें जाना पड़ा । हमलोग अपने कैरियर बनाने में लग गये लेकिन कभी-कभी उन बच्चों से बात हो जाती थी । वो लोग दिन प्रतिदिन पहले से बेहतर होते गए ।

आज पंद्रह साल बाद, शताक्षी और निदा के द्वारा लगाये गए छोटे पौधे ने फल देना शुरू कर दिया था, ये हमारे सपने को साकार होने जैसा था । आज उन सब बच्चों के साथ हम लोगों द्वारा गाया जाने वाला गीत "हम होंगे कामयाब एक दिन" सफल होता प्रतीत हो रहा हैं ।

हम होंगे कामयाब एक दिन,
होगी शिक्षा सब के पास एक दिन ।


#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-१३/१०/२०१६
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Friday, 14 October 2016

"रक्त की जुबानी"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"रक्त की जुबानी"~~~

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प्रणेश की अहले सुबह आँखें खुली नहीं थी कि पता नहीं कौन जोर-जोर से दरवाजा खट-खटा रहा था, आँखें खोलते नहीं खुल रही थी । जैसे-तैसे उसने दरवाजा खोला तो तरवेज को सामने पाया । बिना कुछ कहे वह अंदर सरपट दौड़े चला आया और बिना पूछे ।

हड़बड़ाहट में अपनी बात बोलने लगा कि मकान मालिक की पत्नी रामजानकी अस्पताल के आइ.सी.यू में भर्ती हैं । अभी तक ४ बोतल खून चढ़ चूका हैं डाक्टर अब भी ३ बोतल की सख्त जरूरत बता रहे हैं क्या तुम खून दे सकते हो । मैं प्रणेश का रूमि था, मैं भी वही था मैंने तपाक से पूछ डाला प्रणेश का खून तो हिन्दू वाला हैं क्या यहाँ के धर्म के नाम पर कट्टरता फ़ैलाने वाले नेताओ को इससे कोई परेशानी नहीं होगी, तो वो कुछ बोल नहीं पाया ।


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प्रणेश एक अच्छे दिल वाला इंसान था वह खून देने को तैयार हो गया वो भी तब जबकि वह कल व्रत में था, और उससे भी बड़ी बात ४ दिन बाद उसके सेमेस्टर एग्जाम शुरू होने को थे । प्रणेश मेरा रूमि होने के साथ-साथ एक अच्छा दोस्त भी था, मैंने उसे मना भी किया कि ये पागलपनती हैं एग्जाम सर पर हैं और तुम को इस बात कि फिक्र ही नहीं । उसने बस मुस्कुरा दिया और अस्पताल के लिए निकल पड़ा, शायद ये मानवता के लिए जरूरी था ।

प्रणेश का खून, मकान मालिक की पत्नी से मिल गया डॉ अपने का
में ये और बिना कोई देरी किये डॉक्टर ने खून चढाना शुरू कर दिया । खून चढते ही मकान मालिक की पत्नी की हालत में सुधार होने लगा और अब वह पहले से बेहतर महसूस कर रही थी । लेकिन खून चढ जाने के बाद भी प्रणेश से कोई उसका हाल-चाल पूछने नहीं आया, लेकिन इससे वह तनिक भी दुखी नहीं था अपितु वो खुश था कि उसने अपना कर्म किया हैं 

उसका ये मत था कि खून दान में दिया जाता हैं और वो जिसे दिया जाता उसका रोम-२ उसके लिए कृतज्ञता का आभास कराता हैं । हफ्ते दिन बाद पता चला मकान मालिक की पत्नी के हालत में तेजी से सुधार हो रहा था, अब वह चलने भी लगी थी इधर प्रणेश के एग्जाम भी अच्छे हो रहे थे । खुश था वह अपने जीवन से, बस यहाँ की धार्मिक कट्टरता से परेशान था ।


यह शहर उसे हर वक्त परेशान करता था, इस शहर में कब क्या हो जाए किसी को कोई खबर नहीं होती । यहाँ हर कोई एक-दूसरे धर्म के खिलाफ खून बहाने को तैयार हैं लेकिन अपनों के लिए किसी के पास खून ही नहीं था जिस्म में । लहू "जात-पात, पंथ" नहीं देखता उसे तो बस अपने समूह का साथ मिलना चाहिए, समय पर साथ मिल जाये तो मुरदे में जान ला दें । लेकिन वाह रे भगवान तेरे ही बनाये लोग तेरे नाम पर एक-दूसरे के खून के प्यासे । हे प्रभु ! तूने कैसी दूनिया बनायी हैं, यहाँ खून की एहिमियत लोगों को तब तक समझ में नहीं आती जब तक किसी अपने को लहू की जरूरत ना हो ।


#HINDI #SHORT #STORY


#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- ०७/०६/२०१६
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"अध-कच्चा प्यार"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"अध-कच्चा प्यार"~~~ 

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वैशाख की दूपहरिया में आँख लगी ही थी कि पड़ोस से बिलखने की आवाजें आ रही थी । बाहर निकला तो पता चला निरूपमा नहीं रही, शायद हृदय से जुड़ी को बीमारी थी उसे जैसा कि लोगों ने बताया । भली-चगी तो थी आज सुबह तक अचानक? प्यारी सी नटखट लड़की, उम्र भी कोई ज्यादे नहीं 22-23 वर्ष की रही होगी । माँ ने बताया "इस बीमारी में कब क्या हो जाएँ कुछ पता नहीं, भूकंप जैसी कहानी हैं इस बीमारी की" । दाह-संस्कार के बाद पता चला, उसकी मँगनी भी हो चुकी थी अगले महीने शादी होने वाली थी लड़का किसी कंपनी में सुपरवाइजर था दिल्ली में । शादी की तैयारी घर में ज़ोर-शोर से चल रही थी, अचानक ये हादसा एक झटके में खुशी के महौल को गम में बदल दिया । वैवाहिक निमंत्रण-पत्र भी छप के आ चुकी थी बस बाकी था तो भेजना । 

सबसे बड़ी बात जो पता चली गुप्त सूत्रों से, वो ये कि वह किसी लड़के से प्यार करती थी और उससे ही शादी करना चाहती थी लेकिन बताने में देर कर दी और घरवाले समझ नहीं पाये । उसके मरने से घर की इज्जत गई वो अलग, पुलिस ने पैसे लिए वो अलग । किसी से प्यार करना अच्छी बात मगर जान देकर, अपने घरवाले से प्यार करने वाले अचानक युवावस्था में प्रवेश करते ही किसी को अपनी दुनिया समझ बैठते हैं और बेवकूफी तो देखो उस दुनिया को पाने के लिए दुनिया ही छोड़ देते हैं । 


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दो दिन बाद ही घर में सब सामान्य हो गया, किसी को उसकी बारे में बात करना तो दूर नाम सुनना भी दूभर था । अपने फैमिली से जीत ना सकी लेकिन जिंदगी की जंग तो खुशी-खुशी जीत ही सकती थी । अपने लिए खुशी को पाने के और भी तरीके, शायद निरूपमा ये बात जान ना सकी । कुछ दिनों बाद उसकी माँ रास्ते में अकेले मिली, बात करते-करते अनायास ही निरूपमा की बात आने पर रोने लगी कहने लगी उसने अच्छा नहीं किया एक आवारे लड़के के लिए हमारा नाम घिना दिया । जिस लड़के से उसकी शादी होनी थी, वो सरकारी नौकरी में बड़ा बाबू के पद पर था, घर से भी संपन्न और तो और लड़के वालों ने ही उसे पसंद किया था ।

उसे शादी उस लड़के से नहीं करनी थी पहले बता दिया होता, उसके पापा को मैं मना लेती । मगर उसने तो मेरे कोख को ही बदनाम कर दिया, हर कोई मुझे ही उसके किये के लिए ज़िम्मेवार मानता हैं । उसके पापा उस घटना के बाद उसकी माँ का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते । माँ ने अपनी बेटी को बेटे के समतुलय लाड़-प्यार दिया था, मोहल्ले की लड़कियाँ भी ऐसी माँ अगले जन्म पाने की लालसा रखती थी, उसकी इस बेवकूफी के लिए हर कोई उसकी माँ को ही तो जिममेवार मानेगा । घर आया, मुँह-हाथ धोने गया तब तक माँ खाना ले आयी ।


थके होने के कारण जल्दी-जल्दी खाया और लेट गया, आज की बातों को याद करने लगा । सहसा ही निरूपमा के माँ द्वारा कही बात याद आई, एक माँ के संवेदना को कोई समझ नहीं सकता बेटी के गुजरने पर रो भी नहीं सकती । किसी गुजर चुके मनुष्य की एक छोटी सी गलती कितनों की जिंदगी में कड़वाहट ला सकता हैं वो इस घटना समझ में आया ।


#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-२७/०४/२०१६
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"स्टेशन तक"

लघु कथा सं-१
शीर्षक-"स्टेशन तक"~~~

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बात पुरानी हैं, ऑफिस के काम से पटना जाना हुआ था । पूरे दिन दौड़-भाग के बाद शाम को अन्न नसीब हुआ वो भी सिर्फ "समोसे"। रात को बिस्तर पर जाने के बाद कब आँख लग गयी पता ही ना चला । लोगों से जैसा पटना के बारे में सुना था उससे कुछ हटके था पाटलिपुत्र । सुबह उठते ही नाश्ते में लिट्टी-चौखा खाने को मिला, मुँह में पानी आ गया "जबरदस्त" चटपटा । दोपहर होते-होते ऑफिस का काम निपट चुका था, रात को मेरी ट्रेन होने के कारण मुझे कोई जल्दी नहीं थी । पैदल ही होटल के लिए निकल पड़ा इससे पटना को दिल के करीब से देखने का मौका भी मिला गया था । मैं गाँधी मैदान होते हुए होटल के लिए चल पड़ा जो कि स्टेशन के करीब ही था ।

पटना के ऐतिहासिक चीजों को देखकर मैं इतना अभिभूत था कि कब मैं हम-उम्रों टोली के बीच जा पहुँचा पता ही ना चला । इस बीच उसी टोली में दो आँखें कब अपनी हों गई पता ही ना चला, सब कुछ इतनी जल्दी घटित हो रहा था कि कब एक अनजान सा चेहरा अपना हो गया, समझ में ही नहीं आया । वो मेरे करीब थी और उसने पूछा आपको तो अपने ग्रुप में कभी नहीं देखा, मैंने हँसते हुए कहा तुमसे ही मिलने आया हूँ मजाक में  उसके साथ हल्की-फुल्की बातें करते हुए कब मेरी मंजिल आ चुकी थी पता ही नहीं चला, उसने अपनी हल्की मुस्कान के साथ अपना मोबाइल नंबर देते हुए मुझसे विदा लिया ।

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शाम हो चूँकि थी, मुझे होटल से स्टेशन को निकलना पड़ा, थके होने के कारण कब मैं ट्रेन में सो गया।  दिल्ली पहुँच कर मैं अपने लाइफ में बिजी हो गया, धीरे-2 समय बितता गया अचानक छुट्टी के दिन डायरी से एक पुरजी निकली अचानक ध्यान आया तो मैंने फोन घुमा दिया रिंग होने लगी, उधर से प्यारी सी आवाज आई -हौलो, कौन? मेरे मुँह से बस हल्की सी आवाज निकली "आपका अनजान फ्रेंड" । उसने बोला पहचाना नहीं , मैंने बोला भीड़ में जिसे "आपने अपना समझा" । उसने बोला ओह मैय गाॅड आप इतने दिन बाद कैसे हैं क्या हो रहा हैं और सबसे महत्वपूर्ण सवाल आपका शुभ नाम? बहुत देर तक देर बातें होती रही और उस दिन से हमारी रोज बातें होने लगी और  धीरे-2 हम अच्छे दोस्त बनें, एक-दूसरे से अपने प्राबलम शेयर करते, उसे सुलझाते ।

आज भी 20 साल बाद भी हम दोनों अच्छे दोस्त हैं,  पंद्रह साल पहले मेरी शादी हो गई एक प्यारी लड़की से जिसके लिये मैं ही उसकी दूनिया हूँ और मेरे लिये वो । जिस कॉलेज में वो पढाती थी, आज वो उस कॉलेज की प्रिंसिपल हैं और मैं सफल उद्योगपति । वो मेरे कंपनी की निर्णायक मंडल की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य हैं आज तक उसने जो भी सलाह कंपनी को दी उसने कंपनी को ऊँचाई को छूने के और करीब पहुँचाया ।

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

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राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- ०४/०४/२०१६
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