Tuesday, 13 December 2016

"नव पल्लव"

लघु कथा सं-९
शीर्षक-"नव पल्लव"~~~

------------------------------------------------------------------------------------------------------------

वैवाहिक निमंत्रण-पत्र पढ़ते ही अनायास "ओस की बूँदे कुछ इस तरह से मेरे मन के आँगन में टिप-टिप कर बरबस ही पसर रही थीं कि मेरे यादों के समुद्र में मैं सरपट गोता लगाने लगा" । आज बाबूजी को हमे छोड़कर गए हुए लगभग आठ बरस होने को हैं मगर लगता ही नहीं कि वो हम सबको छोड़कर दूसरी दुनिया जा चुके हैं- मैं तो आज तक इस बात को स्वीकार नहीं कर पाया । उनका प्रेम ही कुछ इस तरह था हमारे लिए की हम तीनो भाईयों को अपने से ओझल देखते ही परेशान हो जाते उनको हमारा ओझल होना शायद बर्दाश्त नहीं था, उस समय इस बात को लेकर हम तीनों झुंझलाते भी थे उस समय उनके प्यार को समझना शायद हमारे बस से बाहर थी मगर आज जब हमारे खुद के बच्चें हैं तो उनकी व्याकुलता समझ में आने लगी हैं । जब तक महाविद्यालय (कॉलेज) से मैं घर नहीं आ जाऊ बड़ी भाभी से पूछ-पूछकर खुद भी परेशान होते और भाभी को भी परेशान करते ये जानकर भी कि मेरे आने का समय अभी नहीं हुआ हैं ।

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama


उनकी जिंदगी जब तक हम सबको ढूँढ़ती रहती, उनका ये कहना था कहीं भी रहों मगर शाम होते-होते घर पहुँच जाओ ये उनका आदेश नहीं प्यार ही था जो हम सबको उनके बातों पर हमारी मुहर लगा देती, हम सबों का सब साथ में एक ही मेज पर खाना खाना होता था (बेटे और बहू में कोई अंतर नहीं एक संग) जो आज भी बाबूजी के चले जाने के बाद जारी हैं । 

किन हालातों में उन्होंने हम तीनों भाइयों की परवरिश में अपना सर्वस समर्पित कर दिया था बाबूजी ने माँ के मर जाने के बाद, उनके त्याग से हमारा रोम-रोम बखूबी वाकिफ था । अभी बमुश्किल से मैंने दो वसंत ही देखें थे कि माँ भगवान को प्यारी हो गई, बाबूजी पर तो जैसे दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा- घर में तीन छोटे-छोटे बच्चें और एक बीमार बूढी माँ ।

उन दिनों हैजा का प्रकोप अपने चरम सीमा पर था जिसने मेरी माँ को भी अपने कालबंधन में जकड़ लिया, हैजा ने हमसे जिंदगी भर के लिए माँ का आँचल छीन लिया । बाबूजी ने अपनी तरफ से माँ के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी थीं लेकिन शायद भगवान ने हमारे भाग्य में एक ही इंसान से माँ-बाप दोनों का वात्सल्य प्रेम लिख रखा था । माँ की बीमारी का जब तक डॉक्टरों को पता लगता तब तक देर हो चुकी थी, डॉक्टरों के अथक प्रयास पर हैजा का काल-बंधन भरी पड़ा ।  

मेरी छोटा होने के कारण उस समय मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था दो साल का बच्चा होता ही कितना सयाना हैं, लेकिन बड़े भैया और छोटे भैया जो कि उस समय क्रमश: आठ वसंत और चार वसंत देख चुके थे को भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि घर में हुआ क्या हैं बस हम तीनों भाई दादी को लिपटकर दादी के साथ रो रहें थें । कुछ लोग दादी को हम तीनों की याद दिलाकर चुप होने को भी बोल रहे थे लेकिन कैसे कोई अपने के जाने पर चुप हो सकता था जिससे उस घर के लोगों की दुनिया बिना दौड़नी थीं, घर को उसकी लक्ष्मी ही तो स्वर्ग बनाती हैं । 


माँ का क्रिया-कर्म संपन्न होनें के बाद, दादी और बाबूजी को हम तीनों भाइयों की चिंता थीं, मगर बाबूजी ने ये बातें दादी से कभी नहीं की । माँ जब इस दुनिया में थीं तब भी बाबूजी बड़े भैया को पाठशाला साथ ले जाते थे अब छोटे भैया को भी साथ ले जाने लगे थे । बाबूजी पाठशाला जाने से पहले जितना उनसे हो सकता था दादी की सहयोग करके जाते, लेकिन घर में काम हे इतने होते थे कि इतना सब कुछ कर जाने के बाद भी दादी को बहुत काम करना पड़ता था घर में तीन छोटे-छोटे बच्चें जो थे ।


बाबूजी दोनों भैया को अपने साथ पाठशाला ले जाते पढ़ने को और इधर घर पर अकेला मैं ही रह जाता था दादी के स्नेहल बगिया में जहाँ उनके प्यार रूपी जल से मेरी फूलों जैसा मन आनंदित हों जाता । दादी के बीमार होने के कारण उनका शरीर बोल जाता इसके बावजूद उन्होंने अपने मन रूपी बगिया को मेरे लिए हर वक़्त गुलजार रखती बिना किसी शिकायत के, कभी-कभी भाई दोनों दादी के प्यार-भरे प्रेम को देख जलते भी थें ।


धीरे-धीरे मैं अपने घर के लिए खिलौना रूपी ख़ुशी की वजह बन गया था, घर में हर कोई मेरे नटखट उन्मुक्त अदाओं का आनंद लेते । दादी के प्यार से मैं इतना ओत-प्रोत रहता की दोनों भैया के पास जाता ही नहीं, इसलिए दोनों भैया मुझे हर वक़्त अपने प्रेम के पालने में लाना चाहते लेकिन मैं हर वक़्त दादी के बगिया में अपने को सुरक्षित समझता ।

माँ के पहली बरसी होने के बाद, दादी बार-बार बाबूजी से फिर से शादी कर लेने को बोलती उनकी नहीं सुनते तो दूसरों से कहवाती मगर बाबूजी ने ठान लिया था कि इस बात पर किसी सुननी ही नहीं हैं शायद उन्हें हमारे कोपल मन को भविष्य के लिए संचित जो करना था । माँ के आकस्मिक निधन ने बाबूजी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था, उन्हें फ़िक्र थी तो दादी और हम तीनों भाइयो की । समय के साथ हम तीनों घर के काम में हाथ बटाने लगे थे बड़े भैया तो अब खाना भी बना लेते थे ।

समय इतनी तेजी से सरपट दौड़ता हैं कि पता ही नहीं चलता, बड़े भैया ने कब स्नातक और छोटे भैया ने अंतर स्नातक उतीर्ण कर ली पता भी नहीं चला । स्नातक किये हुए साल हुए होंगे की उनकी सरकारी नौकरी लग गये, घर में उल्लास का माहौल बन गया और बाबूजी थोड़े निश्चिन्त दिखने लगे थे । बाबूजी के अवकाश में ज्यादा साल नहीं रह गए थे बमुश्किल से पाँच साल रहे होंगे लेकिन अब उनकी चिंता कम हो चली थी । घर में अब भैया कि शादी दबे पाँव ही मगर शुरू हो चुकी थी । सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन दादी ने भी हम सब का साथ छोड़ ये घर अब लक्ष्मी विहीन था बाबूजी अब भैया की शादी जल्द से जल्द करवाना चाहते थे । दादी की बरसी के कुछ दिन बाद ही भैया की शादी बगल के गाँव में बाबूजी के करीबी मित्र की बेटी से तय हुई, दो महीने बाद शादी हो गई । भाभी बहुत सुन्दर, सुशील और सर्वगुण संपन्न तो थी ही साथ ही हम सब की प्यारी भी, उनके आने से दादी के मरने के बाद मुरझाये फूल जैसे फिर से खिल उठे ।

एक साल बाद छोटे भैया की भी सरकारी नौकरी लग गई भैया को प्रशिक्षण के लिए राँची जाना था, छः महीने के प्रशिक्षण के बाद उनका पहला पदस्थापना बगल के जिले में हो गई । सब कुछ सही चल रहा था, बाबूजी छोटे भैया की शादी करने को लेकर एक दिन बड़े भैया और भाभी से चर्चा की तो दोनों ने हामी भर दी । लड़की वाले आने लगे, उनमें से शिक्षिका पर सबकी सहमति थी, अब बस छोटे भैया की सहमति के लिए भाभी ने उनसे अलग में राय ली तो उन्हें भी वो पसंद थीं । शादी बड़े धूम-धाम से हों गई, घर को दो-दो लक्ष्मी मिल चुकी थी ।

समय बढ़ता गया इसी बिच बड़ी भाभी ने वंश को कुलदीपक दिया बाबूजी फूले नहीं समां रहे थे, लेकिन इस ख़ुशी के साल भर नहीं बीते होंगे कि इस हँसते-खिलखिलाते घर को किसी की बुरी नजर लग गई शायद होनी को कुछ और मंजूर था क्योंकि भगवन ने हमारे घर के लिए कुछ और ही लिख चुके थे । छोटे भैया की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई, इस हादसे ने छोटी भाभी पर ब्रजपात तो गिराया तो था ही साथ ही बाबूजी की भी उम्र कम कर दी थी । इस घटना के बाद से भाभी होशों-हवास में नहीं थी, लेकिन इस विषम परिस्थिती में भाभी ने छोटी भाभी को उस बुरे दौर से निकालने की ठानी, उनके अथक प्रयास से छोटी भाभी धीरे-धीरे ही सही मगर सदमे से उबरने लगी ।

इधर बाबूजी का दिमाग कही खोया-खोया रहता, बड़ी भाभी का उनको समझाना भी काम नहीं आ रहा था । जिसका हम सब को डर था वो हो ही गया, बाबूजी को रक्त-चाप की दिक्कत आ ही गई साथ में सिर का दर्द करना आम हो चला था । एक दिन अचानक ही बाबूजी को दिल का दौर पड़ा, पहला अटैक था तो डॉक्टर ने बचा लिया मगर आगे के लिए आगाह कर दिया ।

कुछ दिन बाद भैया के दोस्त की शादी में सब को जाना था, मगर बाबूजी खुद भी नहीं गये और मुझे भी रोक लिया । सबके जाने के बाद जब हम दोनों ने खा लिया और मैं बाबूजी का पैर दबा रहा था तो अचानक बाबूजी ने पूछा "तुम किसी लड़की से प्यार करते हों?" मैं कुछ देर विस्मित था फिर जब दुबारा उन्होंने पूछा तो मैंने नहीं कह दिया । तो बोले एक बात बोलू मैं जिससे शादी को बोलू करोगें उससे शादी, मैंने कहा बाबूजी आपके ही बताये रस्ते पे चलता आ रहा हूँ और आगे भी उसी पथ पर चलना हैं । मैं चाहता हूँ तू रक्षिता से शादी कर ले मैं गुमसुम रहा तो बाबूजी ने पूछा उसमें कोई कमी हैं क्या? मैंने ना में सिर हिला दिया ।

बाबूजी ने समझाते हुए कहा तेरा भैया तो उसे बीच भंवर में छोड़ गया, उसकी जिंदगी पहाड़ जैसी पड़ी हैं । तुम चाहो तो उसकी जिंदगी को खुशियो से भर सकते हों, जब कभी उसकी मांग उजड़ी देखता हूँ सामने अपने बेटे की लाश नजर आती हैं । मैंने उनसे कहा आप समाज के प्रतिष्टि लोगो से इस विषय पर बात कर लीजिये नहीं तो कही उल्टा-पुल्टा न बोलने लगे मुझे अपनी नहीं भाभी के इज्जत की चिंता हैं तो बाबूजी ने अपनी हामी भर दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि वो इस पर भाभी के पिता से भी बात करेंगे वैसे उन्हें किसी की चिंता नहीं है सिवाय अपनी बहू के ।

सुबह जब छोटी भाभी चली गई तो बाबूजी ने बड़ी भाभी से इस बारे में बात की और भाभी को मनाने को बोला तो बड़ी भाभी ने अपनी हामी भर दी । समाज के लोग इस बात में अपनी सहमति नहीं दी तो बाबूजी ने सब से मुह मोड़ लिया अब उन्हें बस अपनी बहू की रजामंदी चाहिए थी लेकिन वो भी नहीं मिल पा रही थी । इसी तकलीफ में एक दिन शाम को अचानक बाबूजी को दिल का दौर पड़ गया इस बार मरते-मरते बाबूजी बचे थे । जब होश में आये तो छोटी भाभी को पुकारा, भाभी रोते हुए उनसे लिपट गये तो बाबूजी ने मुस्कुराते हुए कहा जब तक तुम राजी ना हो जाओ मैं कही नहीं जा रहा । रघु एक अच्छा लड़का हैं उसके तुम अपना घर बसा लोगी तो मैं सुकून से मर सकूँगा, भाभी रोते हुए उन्हें अपनी स्वीकारोक्ति दे दिया । हमारे समाज में यदि किसी पुरुष की पत्नी मर जाए तो वो अविवाहित लड़की से शादी कर सकता है मगर एक विधवा दूसरी शादी नहीं कर सकती हैं । मेरी और भाभी की शादी करवाने के निर्णय ने उन्हें समाज में अलग-थलग कर दिया मगर उनकी दूर दृष्टिता ने कुछ दिन बाद समाज के युवा अवं महिलाओं को प्रेरित कर गया ।

ऐसे ही परिपाटी को बदलने की चाह रखते थे बाबूजी, हम सब उनकी सामाजिक सरोकार से जुड़ी बातो से अवगत थे मगर बाबूजी इतने उदार दिल वाले इंसान थे ये नहीं समझ पाए थे । एक महीने बाद बाबूजी ने मेरी शादी मंदिर में भाभी से करवा दी, थोड़ा अटपटा तो लग रहा था मगर अपनो की ख़ुशी में हे मेरी ख़ुशी थी । छः महीने बीत जाने के बाद हम दोनों नए रिश्ते को स्वीकार कर पाये थे, लेकिन कहते हैं ना प्रेम एक तरह की औषधि हैं जो धीरे-धीरे ही सही मगर घावों को भर देती हैं और लोग नए सपने बुनने लगते हैं उसी का फल था कि हमारे बीच संवाद का कोपल फूटने लगा था, संवाद ही रिश्तों की गरिमा आगे बढ़ाता हैं और वही हुआ । दो साल बाद हम दोनों के वीरान दुनिया में एक नन्हीं परी ने दस्तक दी, बाबूजी जैसे इसी दिन का इंतजार कर रहे थे हफ्ते दिन हुए नहीं की चल बसे ।

आज हमारा पूरा परिवार एक छत के नीचे ख़ुशी-ख़ुशी रहता हैं, भैया-भाभी के वात्सल्य प्रेम के छाँव में रक्षिता जैसी अर्धांगनी का स्नेह जीवन के हर कदम पर मिल रहा हैं एक इंसान को इससे ज्यादा क्या चाहिए इन सबके प्यार के संग परी जैसी बेटी का लड़कपन मेरे जीने की चाह को और पल्ल्वित कर जाता । बाबूजी सही मायने में हमारे समाज को दिशा दे कर विभूति के रूप में अपना नाम कर गए कितनी ही विधवाओं को सधवा बनने की सोच दे गए नहीं तो कुछ साल पहले तक उनलोगों का सोचना मात्र पाप समझा जाता था, इस पुनीत कार्य के लिए उन्होंने मुझे चुनकर मेरा जीवन को कृतार्थ कर दिया । उनके उच्च विचार के कारण ही छोटी भाभी के जीवन हरा-भरा तो हुआ ही संग ही समाज की कई विधवा की जिंदगी गुलजार होने का मार्ग-प्रस्त हुआ, ऐसे तो विरले ही लोग होते हैं जिन्हें अपने इज्जत से ज्यादा अपनों के दर्द की फ़िक्र रहती हों ।

यदि बाबूजी जैसी सोच समाज के हर माँ-बाप की हों जाये तो वह दिन दूर नहीं जब कितनी ही नारियों की उजड़ी जिंदगी में फिर से रंगों की अटखेलियाँ भरी जा सके, और यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि जिस समाज की नारियाँ खुश रहें उस समाज की प्रगति निश्चित हैं ।

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान

------------------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- १३ /१२/२०१६
Share:

Thursday, 24 November 2016

"दृष्टिकोण"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"दृष्टिकोण"~~~
-------------------------------------------------------------------------------------------------

विद्यालय से आया ही था कि बगल के घर से रोहित कहीं चलने को बुलाने आया था । रास्ते में चलते-चलते उसने बताया भाई तुम्हारी मुँह बोली दादी अब नहीं रही । बुद्धिया दादी वैसे तो हमारे घर का चौका-बर्तन करती थी, लेकिन वो मेरे घर के लिए इज्जत की पात्र थी । मेरे घर में जब भी वो आती लगता था दादी का सानिध्य में प्रेम का रस जी लेता हूँ । मेरी अपनी दादी का स्वर्गवास मेरे जन्म से पहले ही हो गया था जबसे होश संभाला था उन्हीं को अपनी दादी समझता था क्योंकि वो मुझे मुझसे ज्यादा जो प्यार करती थी । ऐसा कभी लगा ही नहीं की वो हमारे परिवार की सदस्य नहीं हैं, उनका वात्सल्य प्रेम से मुझे ऐसा महसूस होता कि जैसे हमारा कोई पुराना नाता हैं । 

दादी जिंदादिल इंसान थी, अनपढ़ होते हुए भी सामाजिक रिश्तों के ताने-बूने को समझती थी और इसी गुण के कारण दूसरें के दर्द को अपना दर्द समझने लगती । इसी बीच हम दोनों आपके घर पहुँचे तो पता लगा, आपको घर नहीं लाया जा सका हैं, फिलहाल आप अस्पताल में ही हैं । आनन-फानन में हम दोनों अस्पताल पहुँचे तो देखा आपका बेटा जो कि बैंक में नौकरी करते हैं, किसी अंग-दान वाली संस्थान से संपर्क करने में व्यस्त थे । किसी ने बताया कि दादी ने अपना अंग-दान कर दिया हैं तो दादी की कहीं कुछ बातें जो उस समय मेरे से परे थी स्मृति-पटल पर सरपट दौरने लगी ।

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

बोलती थी मैं रहूँ ना रहूँ मगर मेरा दिल और आँखें इस दूनिया में जीवित रहेगी । लेकिन उस समय छोटा होने के कारण उनकी इस छोटी सी मगर मोटी बात को मैं समझ नहीं पाता था ।

लोगों का तांता लगा था दादी को देखने के लिए, हमारे गाँव ही नहीं अपितु पूरे जिले में पहली इंसान थी जिन्होंने अपना अंग-दान किया था, आज मेरे नजर में उनका स्थान पहले से बढ़ गया । लोग बता रहें थे कि दादी के पति की मौत किडनी फेल होने के कारण हो गई थी । चिकित्सक ने उनसे कहा था कि की काश यदि ट्रांसप्लांट करने के लिए किडनी मिल जाती तो आज तुम्हारे पति शायद जिंदा होते । जबकि हर दिन हजारों लोगों मरते हैं और यदि उनमें से आधे भी अपना अंग किसी दूसरे के लिए दान कर जाते तो हजारों को नया जीवन मिल सकता हैं साथ ही मरे हुए इंसान को दूसरे के नजर से इस दूनिया में ना रहते हुए भी इस दूनिया को देखते रहने की सौगात मिल जाती ।

दादी के मृत शरीर के पास बैठे उनकी बहू-बेटी की आँखों में आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, उनकी उम्र ही क्या हुई होगी लगभग पचास के करीब तो थी । मैंनें बुआ का हाथ थाम भावावेश में फफक-फफककर रोने लगा तो वो भी रोते हुए बोलने लगी, देख ना आशु, मेरे माँ के मरने पर भी ये लोग उसके शरीर को छलनी करने को आतुर हैं, क्या अकेले मेरे माँ के अंगदान करने से पूरे संसार के लोगों की जान बच जाएगी? हमारी सुनता कौन हैं? अब इस पर मेरा अधिकार नहीं मैं पराई जो हो ठहरी ।

तभी दादी के बेटे भी वहाँ पहुँच गये और बोला, ये पूरी तरह से माँ का व्यक्तिगत निर्णय था । जब बाबा मरे थे तो चिकित्सक ने माँ जो कुछ कहा उन बातों ने माँ के दिल को अंदर तक झकझोर गया । जिस समय बाबा मरे उस समय उनकी उम्र ही क्या रही थी २८-२९ (28 -29) साल जब वो मरे तो एक इंसान की मौत नहीं हुई थी अपितु एक खुशहाल परिवार की मौत हुई थी । माँ ने हम लोगों को कैसे पाला-पोषा वो तुम मेरे से ज्यादे अच्छे से जानती हों । यदि उस समय लोगों में अंग-दान करने की प्रवृत्ति होती तो शायद उनकी ये जिंदगी वीरान ना होती । और इन्हीं सब बातों ने माँ को अपना अंग-दान करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने अपने पति के पहली बरसी पर अपना अंग-दान करने के लिए पंजीयन करवाया था ।

मुझे तो गर्व हैं अपनी माँ पर और तुम्हें भी माँ के इस फैसले पर गर्व करना चाहिए कि माँ की सोच कितनी स्वभाविक एवं व्यावहारिक थी । समाज में अपने शक्ति के हिसाब से लोगों के सुख-दुख में साथ रहने वाली मरने के बाद भी आठ-दस लोगों के जीवन को गुलजार कर गई हैं । ये माँ की अंतिम इच्छा थी और मैं अपनी माँ की सारी इच्छा पूरी करूँगा, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर मैंने और तेरी भाभी ने भी फैसला कर लिया हैं की हम भी अंग-दान करेंगे ।

काश ! दादी और उनके बेटे की तरह हर किसी की सोच हों जाये तो भारतवर्ष में प्रतिवर्ष लाखों लोगों को नया जीवन ही नहीं मिलेगा बल्कि कोई असमय ही काल का कोपभाजन नहीं बन पाएगा ।

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान
-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- २४ /११/२०१६
Share:

Tuesday, 15 November 2016

"ठहराव से आगे"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"ठहराव से आगे"~~~

-------------------------------------------------------------------------------------------------


अपने कक्षा के प्रवेश द्वार पर जैसे ही मैं और मेरा दोस्त रमापति पहुँचे, कक्षा में इतिहास की शिक्षिका का पहले ही आगमन हो चुका था । मगर ये क्या आज सरोजनी मैडम की जगह कोई नई प्राध्यापिका पढ़ाने आई हैं । हम दोनों ने कक्षा में प्रवेश देने के लिए उनसे आज्ञा माँगी और उन्होंने बिना समय गंवाये हमे कक्षा में आने की अनुमति दे दी । कक्षा का अवलोकन करते हुए उन्होंने अपने बारे में हल्की-हल्की मुस्कान के साथ संक्षिप्त में बताना शुरू किया, वातावरण में जैसे फूलों के फव्वारें हवा में तैर रहें थे । इसी बीच उन्होंने अपना नाम प्ररेणा सिंह बताया और वो फिलहाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए (इतिहास) अंतिम वर्ष की छात्रा हैं और हमारे महाविद्यालय में अनियमित प्राध्यापिक के रूप इतिहास पढ़ाएगी । मैं बी.ए (अंतिम वर्ष) का छात्र हूँ व मैं और रमापति एक ही गाँव के हैं जो कि जिला मुख्यालय से बहुत दूर स्थिति हैं । रमापति और मैं अपने कक्षा के सामान्य छात्र रहें हैं, बी.ए (स्नातक) के अंतिम वर्ष तक सफर तय करने तक में पढ़ाई से ज्यादा हमने मस्ती की हैं । अभी तक हम दोनों ने अपने भविष्य के बारे में कुछ खास नहीं सोचा था, बस समय के बहाव में बहे जा रहे थे । आज प्ररेणा मैम ने हल्की-फूलकी बातें की ही थी कि घंटी बज गई और वो चली गई ।

मैम जितनी अच्छी वक्ता थी उतनी ही सुंदर भी और शायद दिल की उससे भी ज्यादा । दूसरे दिन मैम फिर पढ़ाने आई, आज वो हमारे कैरियर को लेकर बात कर रही थी । इतिहास का हमारे कैरियर में क्या महत्व हो सकता हैं, हम इसके महत्व को समझें तो क्या कर सकते हैं इत्यादि । ये सब सुनने के बाद इतिहास जो पहले मेरे स्नातक पास करने के लिए विषय मात्र थी अब नागमणि जैसी प्रतीत होने लगी थी । अब मैं मन लगाकर इतिहास की गहराई तक जानने कि कोशिश करने लगा था और इसमें मैं प्रेरणा मैम का सहयोग ले रहा था । हम दोनों हम उम्र होने के कारण अच्छे दोस्त बन गये थे, मेरा उनसे व्यक्तिगत रूप से रोज मिलना अब मेरी ज़रूरत बन गयी थी - उनको मेरी और मुझे उनकी, शायद मैं उनकी ओर आकर्षित या ये कहू कि मुझे उनसे प्यार हो लगा था तो इसमें कोई अतिशोयक्ति नहीं होगी । सब कुछ अच्छा चल रहा था, एक दिन मैंने उनसे प्रशासनिक प्रतियोगी परीक्षा के बारे में पूछा क्योंकि इसके बारे में मैम से कक्षा में कई बार सुन रखा था, मगर कभी इस परीक्षा को देने की नहीं सोची थी लेकिन इसका रूतबा मुझे आकर्षित कर रहा था । अब मैम मेरे जिन्दगी का अहम हिस्सा बन गई थी और उनसे एक दिन नहीं मिलना मुझे एक साल जैसे लगने लगता था, आज रविवार के दिन मेरा बुरा हाल हो रहा था । आज हिम्मत करके मैं मैम से मिलने उनके घर जाने की सोच रहा था, मगर मेरे जमीर ने मेरे पैरों में बेरिया डाल दिये ।

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

अब कुछ ही दिन बचें थे अंतिम वर्ष की परीक्षा में, आज सोमवार को फिर मैम से मिलने उनके कैबिन में मिलने गया तो मैं मैम को देखता ही रह गया वो लाल साड़ी में क्या गजब की सुंदर लग रही थी, मेरी नजरे उनको एक टक देखता ही रह गया । जब मैम ने कहा कहाँ खो गये शशि तो मैं वर्तमान में लौटा वो शरमाहट के साथ और वो  मंद-मंद मुस्कुरा रही थी । उनके लिए आज मैं कुछ ज्यादा ही सोचने लगा था जबसे उनसे मिलकर आया, मन को थोड़ा गलत भी लग रहा था मगर प्यार को तो बस दिल ही समझें ।

अगले दिन मैम से मिलने की ठानी क्योंकि फाइनल एग्जाम में बहुत दिन नहीं रह गये थे और इसलिए मैम को बोल आया कि मैम कल आप छुट्टी ले लो मुझे आपसे अपने कैरियर के बारे में विस्तार से बात करनी हैं क्योंकि मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा यदि यही हाल रहा तो मैं बी.ए भी पास नहीं कर पाऊंगा, वो जरा मुस्कुराये और समय ना होने की बात बोल ना कह दिया, लेकिन मेरे अनुनय-विनय करने के बाद वो मान गयी और उन्होंने पूछा हम लोग कल कहा जा रहे हैं मैंने कहा कल हम लोग चिड़ियाघर चलेंगे इसी बहाने घूमना भी हो जायेगा और आपके गाइड से मुझे आगे क्या करना चाहिए उसका भी निर्णया हो जायेगा । हम दोनों तय समय पर चिड़ियाघर के प्रवेश-द्वार पर पहुँच गये, अंदर पहुँचकर हमने एकांत स्थान ढूँढा फिर इधर-उधर की बातें करते हुए हम दोनों ने अपने कैरियर के बारे में बात करनी शुरू की । मैम ने अपना कैरियर अध्यापन में ही बनाने कि बात कहीं और मुझसे पूछा कि तुम बी.ए के बाद क्या करोगें तो मैंने कहा मेरी इतिहास में रूचि तो हैं मगर साथ ही मेरा दिमाग प्रशासनिक सेवा की तैयारी करने को भी आकर्षित कर रहा हैं, तो मैम ने मुझे समझाना शुरू किया, तुम आगे एम.ए कर सकते हों उसके बाद नेट निकालो उसके बाद इतिहास के क्षेत्र में अनुसंधान कर इस विषय में अपनी विशिष्ट स्थान बना सकते हों या फिर जेनरल कंपटीशन की तैयारी कर के एक अच्छी नौकरी पा सकते हो, और यदि थोड़ा सी धैर्यता और लगन हों तो अपने दिमाग का उपयोग करते हुए समाज के लिए कुछ अच्छा करने की क्षमता रखते हों तो प्रशासनिक सेवा तुम्हारे लिए ही हैं मेरे दोस्त, तुम बेझिझक हो कर इसकी तैयारी कर सकते हों, भगवान ने बुद्धि तो दी ही हैं साथ ही कद-काठी भी डी.एम या एस.पी पोस्ट को सूट करेगा ।

मैम आज लाल साड़ी में इतनी सुन्दर लग रही थी की मैं अपने आँखों को उनके चेहरे से हटा ही नहीं पा रहा था, मैंने उनके खूबसूरती को अपने तारीफ का नाम दे दिया और वो हँसते हुए तारीफ स्वीकार कर गई । लेकिन पता नहीं कैसे अचानक बातों ही बातों में मेरे जुबान से निकल गया कि मैम मैं आपको पसंद करने लगा हूँ और बिना आपके मेरा जीवन शायद अधूरा हैं आप मेरे जीवन की जरुरत हों । निः शब्द होकर मैम, मुझे निश्छल भाव  निहार रही थी और कुछ देर बाद अपने आपको सँभालते हुए उन्होंने मुझे समझाने की मुद्रा में बोलना शुरू किया आप मेरे छात्र हों, ये अलग बात हैं कि हम अच्छे दोस्त हैं मगर ये बातें सोचना आप जैसे अच्छे इंसान को शोभा नहीं देती । मुझे उस समय कुछ समझ नहीं आ रहा था, पता नहीं मेरे दिमाग को क्या हो गया था, मेरी लोक-लाज कहा चली गई थी और कहाँ से इतनी हिम्मतआ गई थी की मैंने दुबारा मैम से मैंने पूछा, आप मुझे पसंद करती हैं क्या?, तो तपाक से मैम ने बोला तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हों गई तुम जैसे इंसान को अभी आपने कैरियर को बनाने पर ध्यान लगाना चाहिए ना कि इन सब बातों में अपना समय जाया नहीं करना चाहिए ये बस एक आकर्षण मात्रा हैं जो समय के साथ ख़त्म हो जायेगा । इसलिए अपने लक्ष्य की ओर सोचना शुरू करो ना कि मेरे बारे में, यदि जिंदगी में अच्छे सरकारी अधिकारी बन गए मेरे से ज्यादा सुन्दर लड़की के पिता जिनका की रुतबा भी होगा वो तुम्हारे दरवाजे पर आयेगे अपनी बेटी के लिए हाथ माँगने, मगर मैं था कि कुछ समझने की कोशिश नहीं कर रहा था बस बार-बार एक ही रट लगा रहा था कि "क्या मुझे आप प्यार करती हैं, हाँ तो क्या आप मुझसे शादी करेंगी" इससे खीज कर मैम गुस्से में बोली ठीक हैं लेकिन क्या तुम्हारी इतनी भी हैसियत हैं की तुम मेरी दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा कर सको । 

आज उनका प्रचंड रूप मेरे सामने था, वो इतने गुस्से में थी की उन्होंने खुद एक शर्त रख दी कि यदि तुम आई.ए.एस बन गए तो मैं तुमसे ख़ुशी-ख़ुशी शादी करूँगी उस समय तुम कहीं ना, ना कर दो मुझे इस बात का डर रहेगा । आज से मेरा ये मन तुम्हारी अमानत और इसको संभाल कर रखना मेरी जिम्मेवारी ।  मैंने उनसे भारी मन से विदा लिया, इन वादों के साथ की- कि बी.ए परीक्षा के बाद मैं तैयारी के लिए दिल्ली चला जाऊँगा यदि सफल हुआ तो आपसे मिलूँगा वरना कभी नहीं । पूरे रास्ते भर मैं यही सोचता रहा मैं ये सब कैसे करूँगा साथ ही बिना मैम के मैं कैसे रह पाऊंगा लेकिन संग-संग एक जुनून जो सवार हो गया था मैम से किया वादा जो पूरा करना था हर हाल में अब । 

इसी बीच बी.ए की परीक्षा आरंभ हो गयी और कुछ दिनों में परीक्षा फ़ल भी आ गया  मैं इस वर्ष अपने वर्ग में  प्रथम आया था और यह सब मैं पिछले साल तक सोच भी नहीं सकता था यह तो प्रेरणा मैम के कारण संभव हो पाया था । अब मैं अपने नए लक्ष्य को पाने के लिए दिल्ली रवाना हो चुका था, कुछ दिन तक तो मेरा उनके बिना मन नहीं लगा उनकी आदत जो लग गई थी, लेकिन जिस मकसद से मैं दिल्ली आया था वह ध्येय भी बार-बार स्मरण हो रहा था । एक बार तो मन हुआ सब कुछ छोड़-छाड़ कर मैम के पास चला जाऊँ लेकिन फिर अपने वादे याद आते, वो वादे ही मेरे दृढ़ निश्चय की वजह बनी । और अब मेरा एक ही ध्येय रह गया था आई.ए.एस बनना और बस दिन रात-दिन उसके लिए ही जी जान से मेहनत करना ।

समय बीत ता गया, फार्म भरने की तारीख अपने समय पर आइ मगर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे परसों की ही तो बात हैं जब मैंने तैयारी शुरू की हैं । मैंने फार्म भरा और दुगूने मन से लग गया तैयारी में, लगभग दो महीने बाद मेरा प्रवेश-पत्र भी आ गया मेरे तैयारी किस स्तर की हैं वो भी दिखाने का समय आ गया था । मैं अब रिविजन में लग गया, सब कुछ अचल चल रहा था। मैं अपने तैयारी से संतुष्ट था, बस अब मुझे अपने मन और दिमाग  को परीक्षा-भवन में एकाग्रचित रखना था । समय इतनी तेजी से बीता रहा था कि की आई.ए.एस (प्री) एग्जाम देने का दिन भी बहुत क़रीब आ गया अगले रविवार को मेरा पेपर होना था जिसके कारण मेरे ऊपर थोड़ा दबाब था  मगर एग्जाम का दिन आते-आते मेरे सारे तनाव दूर हो चुके थे । मेरा एग्जाम उम्मीद के अनुसार गया, मुझे अपने पर विश्वास था कि मैं प्री आसानी से क्वालीफाई कर जाऊँगा इसलिए मैं मुख्य परीक्षा की तैयारी में जोश-खरोश से लग गया ।

एक महीने के बाद एक दिन रात के करीब ११ (11) बजे मेरे एक  दोस्त का फ़ोन आया जो खुद भी आई.ए.एस की तैयारी कर रहा था ने बताया कि परिणाम आ गये नेट पर देख लों मैंने उसके बारे में पूछा तो उसने अपने सफल होने की बात कहीं मैंने उसे बधाई दी और के लिए ढ़ेर सारी शुभकामनाएं दी । मेरा नेट काम नहीं कर रहा पाया तो  मैंने रमापति को फ़ोन लगाया तो वो नेट पर ही काम कर रहा था, उसने जैसे ही कहा मुँह मीठा करा मैं समझ गया मैंने मुख्य परीक्षा के लिए क्वालीफाई कर लिया हैं, आज पूरी रात नींद ना आनी थी।  मुख्य परीक्षा के लिए मैंने दिन रात एक कर दिये, रोज हर विषय को पढ़ना और उनको अपनी भाषा में मेरा दिनचर्या हो गया था । मेरी तैयारी समय के साथ और अच्छी होती गई । मुख्य परीक्षा भी शुरू हो गये, थोड़े थकाऊ मगर उम्मीद भरें । जितने पेपर होते गये लक्ष्य उतने करीब दिखता गया, क्योंकि सारे पेपर अच्छे हो रहे थे । सारे पेपर अच्छे होने के कारण मैं साक्षात्कार की तैयारी में लग गया, समय बीतता गया मैं एक अलग ही दुनिया में जी रहा था जहाँ मैं अपने होने की कभी सोच भी सकता आज से दो साल पहले तक मगर आज मैं आई.ए.एस बनने सोच रहा हूँ तो बस अपने प्यार के मार्गदर्शन के और आज अपने लगन के कारण ।

मुख्य परीक्षा के परिणाम भी मेरे पक्ष में आये थे वो अच्छे नंबरों से और मैं आई.ए.एस बनने से बस एक दूर थ, और इसी परिस्थिति में अपने बौद्धिक क्षमता के संग लोगों के बीच अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने की कला में निखार लाने की कोशिश में लगा था और उसमे बहुत हद तक सफल भी हो रहा था । इन्हीं सब के बीच मुख्य परीक्षा के परिणाम आ गए, मैंने यह चरण बहुत अच्छे अंको से क्वालीफाई किया था इससे मेरे आई.ए.एस सेवा में आने को पंख लग गए, शायद इस बार भी भगवान ने मेरे परिश्रम का फल मेरे भाग्य में डाल दिया था ।

अब बस मुझे साक्षात्कार अच्छे से हो जाये इसकी चिंता थी क्योंकि हर किसी के मुँह से डरावनी बाते सुनी थी।  आज वो दिन आ गया था जिसको मैं आज के दिन भी सपने जैसा समझ रहा था ।  मुझे साक्षात्कार के लिए दिल्ली ही बुलाया गया । साक्षात्कार लेने वाले बोर्ड का व्यवहार सहियोगात्मक था जिसके कारण मेरा साक्षात्कार बहुत अच्छा हुआ,  आज तक जितना उनके बारे में बुरा सुना था सब सरा-सर गलत था । अब मैं पूरी तरह से आश्वत था कि मेरा दो सौ (२००) के अंदर नाम आयेगा । तब भी मैं आगे कि तैयारी में लग रहा, थोड़े तनाव में भी था मगर आशा बनी हुईं थी ।

वो दिन भी आ गया जिसका मुझे ही नहीं मेरी जिंदगी को भी बेसब्री से इंतजार था । मेरे जिंदगी का सबसे अहम दिन आ गया था मैं अपने लक्ष्य में सफल हुआ था मैंने १५८ (158वाँ) स्थान पाया था और आई.पी.एस (पुलिस सेवा) मिलने की उम्मीद थी । परिणाम आते ही मैंने अपने बोरिया-बिस्तर समेटा और आज दो साल बाद घर जाने को सोचा वो भी अपने वादे के पुरा करने के बाद । मैंने बिना किसी को बताये घर पहुँचा और मैंने जब माँ-बाबू जी को ये खुश खबरी दी तो बाबू जी नम आँखों से गले लगा लिया और माँ तो बस रो रही थी ये ख़ुशी के आँसू हर बेटा अपने माँ-बाप के चरणों में रखना चाहेगा ।  धीरे-धीरे ये समाचार मोहल्ले में फ़ैल गई, मोहल्ले के लोगों का बधाई देने का सिलसिला चला वो शाम तक चलता रहा। अगले दिन मेरा इंटरव्यू लेने दैनिक अखबार के पत्रकार मेरे घर आ गये, उसके अगले दिन अखबार में मेरा इंटरव्यू छपा था । आज परसो से भी ज्यादा लोगों का तांता लगा हुआ था, दोपहर को मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य के साथ दो-चार शिक्षक भी आये थे मगर जिसका इंतजार था वो ना आया। शाम को मेरे साथ के कुछ दोस्तों के साथ कुछ जूनियर भी मिलने आये, बधाई देने के बाद उन्हीं में से एक बच्चे ने बोला सर हम लोग आपके सम्मान में एक छोटा सा समारोह करना चाहते हैं आप अपना कीमती समय कब दें सकते हैं मैंने कहा जब तुमलोगों कहो लेकिन जो करना हों इस सप्ताह में कर लो बस एक दिन पहले बता देना, क्योंकि हो सकता हैं अगले हफ़्ते मुझे निकलना पड़े ।

मंगलवार को महाविद्यालय से फ़ोन आया की बच्चों ने तैयारी कर ली, क्या कल आप अपना समय दें सकते हैं, मैंने दस बजे के लिए अपनी हामी भर दी । सुबह-सुबह मोहल्ला के ही वो बुधवार भी आ गया जिसका मुझे दो बरस से इंतजार कर रहा था, महाविद्यालय परिसर में पहुँचते ही मेरी नजरे बेसब्री से प्रेरणा मैम को ढूँढ रही थी । लेकिन वो कहीं नजर नहीं आ रही थी, मैं अपने हावभाव से शांत दिखने की कोशिश कर रहा था लेकिन मेरी ये कोशिश नाकाफी हो रही थी हो भी क्यों ना, दिल किसी की सुनता थोड़ी ना हैं वो तो बस अपनी ही करता हैं । मेरी निगाहें तो बस प्रेरणा मैम को ढूँढ रही थी लेकिन पता नहीं वो कहीं दिख क्यों नहीं रही थी । मैंने जब चपरासी से पूछा तो उसने कहा मैडम आयी तो हैं लेकिन अभी दिखी नहीं रही, शायद कार्यक्रम की तैयारी में लगी हों । कुछ देर के बाद मंच से उद्घोषणा शुरू हुई कमला मैम मेरे बारे संक्षिप्त में बता रही थी इसी बीच उन्होंने प्रेरणा मैम का नाम मुझे स्मृति चिन्ह से सम्मानित करने के लिए बुलाया । मेरा दिल धड़क भी रहा था और उनको देखने के लिए बेचैन भी होये जा रहा था, मैं ये सब सोच ही रहा था वो भीड़ से निकलते ग़ुलाबी साड़ी में क्या सुन्दर लग रही थी बताना मुश्किल हैं (जिसके कारण मैं आज यहाँ तक पहुँच पाया उसी से सम्मान मिलना कितनी बड़ी बात हैं) । जब हम दोनों के नयन मिले तो वो मेरे जीवन का अनुपमये क्षण था, कार्यक्रम होने के बाद उन्होंने मुझे कल कहीं दूर चलने को कहा एकांत में, मैंने हामी भर दी । हम लोग दूसरे दिन अहले सुबह लखनऊ ट्रेन से निकल गए रास्ते में सामान्य बातें चलती रही स्टेशन पहुँचते ही हम दोनों चिड़ियाघर के लिए टैक्सी ली । चिड़ियाघर में प्रवेश करने के बाद उन्होंने सबसे पहले बधाई दी उसके बाद इन दो सालों में हम दोनों अपनी-अपनी बातें साझा करने लगें । जिस तरह से मैंने अचानक ही उनसे अपने दिल की बात कहीं थी, वैसे ही मस्ती के अंदाज़ में उन्होंने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया, मैं तो हक्का-बक्का ही रह गया मेरे कानों में बस बार-बार एक ही आवाज गूंज रही थी "मुझसे शादी करोगें"? जिसे पाने के लिए मैंने अपना सब कुछ इन दो साल तक झोंक दिया था वो अमानत सामने खड़ी थी, लेकिन मैं जिसके सहयोग से यहाँ तक पहुँच पाया वो मेरी शिक्षिका ना हो के मेरे मन की सखी जिसका मेरे जीवन में ना होना मछली के जीवन में जल का ना होना जैसे होगा ।  मैंने गंभीर होते हुए मैम को कहा मेरे ठहरे हुए जीवन को जिसने एक दिशा दी उसका वरन मैं तो नहीं कर सकता लेकिन मेरा दिल आज भी आपको उतना ही प्यार करता हैं जितना की कल तक, आप यदि मुझे अपना सकती हो तो मैं अपने आपको नहीं रोकूँगा आपका होने से । उनके आँखों से आश्रु बहने लगे और वो मेरे सीने से लगा गई और रोते हुए बोलने लगी यदि उस दिन मैंने तुम्हारे जुनून जो कि गलत था, के लिए शर्त नहीं रखती तो शायद तुम अपनी शक्ति को कभी समझ ना पाते, मेरे चेहरे पर शून्य भाव में था को मैम ने महसूस करते हुए कुछ क्षण बाद अपने आपको मेरे से अलग किया और कहा मुझे तुम पर गर्व हैं कि तुम जैसा इंसान मुझे प्यार करता हैं । आज के और पुराने शशि में अंतर साफ़ झलक रहा हैं मैं तो सदैव की तुम्हारी ऋणि हो गई जैसे सुखी धरती बरसात की । लेकिन हर रिश्ते की अपनी एक गरिमा हैं और उस गरिमा को तोड़ने का की तब जरुरत होती हैं जब उसके पीछे स्वार्थ छिपी हों और हमारे रिश्ते में अब वो बात कहा । जाते-जाते बस ये कह गई, हमारा ये रिश्ता हर बंधन से मुक्त हैं इसलिए किसी बंधन में बंधना इस रिश्ते को ऐसे बंधन की जरुरत नहीं बस मुझे अपने दुआओं में याद रखना और बातों का सिलसिला कभी थमने ना पाये बस इतना सा ख्याल रखना..........

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- २/११/२०१६
Share:

Sunday, 30 October 2016

"दीपोदय"

लघु कथा सं-६
शीर्षक-"दीपोदय"~~~

------------------------------------------------------------------------------------------------------------


कुछ दिनों से कक्षा में सौम्य का मन ना लगना श्री अखिलेंद्र को परेशान कर रहा था, क्योंकि विज्ञान में वह इस बार फेल हो गया था जबकि विज्ञान उसका पसंदीदा और मजबूत विषय जो था । अपना लेक्चर समाप्त होने के बाद अखिलेंद्र सर ने उसे घर जाने से पहले उनसे मिलने को बोल चले गए । सौम्य जो कि पढ़ने में होशियार के साथ-साथ व्यवहार-कुशल भी था, यही बात उसे दूसरे बच्चों से अलग करती थी ।

कक्षा में वो यही सोच रहा था कि सर ने आज क्यों बुलाया हैं, आज तक तो कभी सर ने नहीं बुलाया था फिर आज क्यों, कहीं मेरे से कोई बड़ी गलती तो नहीं हो गयी । पूरे दिन इसी बारे में सोचते हुए किसी तरह उसने अपने सारे कक्षाएँ पूरी करने के बाद व्याकुलता और डर के मिश्रित भाव के साथ वो धीरे-धीरे कदमों से अखिलेंद्र बाबू के केबिन तक पहुँचा और अंदर आने के लिए जैसे ही आवाज लगाई उसे अखिलेंद्र बाबू ने अंदर आ जाने को बोला जैसे अखिलेंद्र बाबू उसका  ही बेसब्री से इंतजार कर रहे हो ।

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

इधर-उधर की बातों के साथ  अखिलेंद्र बाबू ने उसके परेशानी के बारे में पूछना शुरू किया । सबसे पहले उन्होंने उससे कहा आजकल तुम्हारा पढ़ने में मन नहीं लग रहा क्या जो मेरे विषय में तुम्हारे इतने कम नंबर आयें और तुम्हारा कक्षा में भी तुम्हारा ध्यान कहीं और लगा रहता हैं नहीं, कोई परेशानी हो तो बताओं । झिझकते हुए सौम्य ने अपनी बात शुरू कि सर माँ के अलावा मेरा कोई इस दूनिया में अपना नहीं, माँ सिलाई करके मेरी परवरिश कर रही हैं । लेकिन वो अब बीमार रहती हैं, जिसके कारण घर का खर्चा भी नहीं निकल पाता हो सकता हैं मुझे अगले महीने स्कूल से भी निकाल दिया जाए ।

उसके माँ की तबियत खराब और घर की माली हालत पर अफसोस करने के बाद

सर : दीवाली में कितने दिन रह गये हैं ?
सौम्य : चार दिन ।
सर : इस बार दीया जलाओं क्या?
सौम्य : बिल्कुल सर ।
सरः कोई कारण है या बस ऐसे ही जलाते हैं दीया?
सौम्य : सर ज्यादा कुछ तो नहीं पता माँ ने बताया था कि १४ के वनवास से प्रभु राम के लौटने की खुशी में दीपावली मनायी जाती हैं ।

सर : बिल्कुल सही, अब मैं तुम्हें दीया के बारे में बताता हूँ । दीया रूपी हमारे शरीर को अपने अंदर के बाती रूपी सपने को साकार करने हेतु अपने परिश्रम से अर्जित ज्ञान रूपी घी का उपयोग अपने अंदर के अंधियारे रूपी जीवन को प्रकाशमय कर पाओगे तभी अपने अंदर के डर रूपी कीड़े-मकोड़े का अंत कर पाओगें ।

यहीं समझाने के लिए तुम्हें बुलाया था कि अपने जीवन को दीया की तरह बनाने के लिए प्रयत्नशील रहो जिस तरह से दीया के प्रकाश से आस-पड़ोस की जगह भी प्रकाशमान होती हैं ठीक उसी तरह तुम्हारे तेज से आस-पड़ोस के बच्चों में कुछ कर गुजरने की इच्छा जगेगी । तुम चाहो तो दीपावली बाद शाम पाँच बजे से १ से ६ तक के बच्चों को पढ़ाने आ सकते हो जिससे तुम्हारे घर का खर्च भी निकल जायेगा और माँ का बोझ भी कम हो जायेगा, साथ ही तुम्हारा बेस भी मजबूत हो जायेगा संग ही तुम्हारे व्यक्तित्व में भी निखार आयेगा । ये सब सुनने के बाद सौम्य के आँखों में आँसू आ गये, ये देखकर अखिलेंद्र बाबू डर गये । उन्होंने जब पूछा मेरी बातों ने दुख पहुँचाया क्या? इतना अखिलेंद्र बाबू के कहते ही सौम्य उनसे लिपट कर रोने लगा, उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और पानी पिलाया । फिर जब सौम्य शांत हुआ तो सौम्य ने कहा मैं अब कभी डरूगा नहीं बल्कि अब हर परिस्थिति का सामना करूँगा, क्योंकि आपने मेरी जीवन के सोचने के दृष्टिकोण को ही बदल दिया । आज आप ना होते तो हो सकता था मैं कल से कहीं मजदूरी कर रहा होता । ये कहते हुए वो फिर भाव-विहल हो गया, अचानक उसे माँ की याद आयी । उसने सर से बोला, माँ इंतजार कर रही होगी अब मैं चलता हूँ सर, कल से सर आपको आपका नया सौम्य मिलेगा जो निडर और साहसी के साथ-साथ घबराना भूल कर संकट में हँसना जानता होगा ।

आज बहुत दिन बाद अखिलेंद्र बाबू मंद-मंद मुस्कुरा रहें थे और उसे सौम्य को जाते हुए निहार भी रहे थे , क्योंकि आज उन्होंने अपने एक दीया को बुझने से जो बचा लिया था । 

#Sandesh2Soldiers  #Dedicated_to_Soliders

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान

------------------------------------------------------------------------------------------------------------


राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-३०/१०/२०१६ (शुभ दीपावली)
Share:

"प्रेमल मन"

लघु कथा सं-५
शीर्षक-"प्रेमल मन"~~~

-------------------------------------------------------------------------------------------------

स्टेशन पहुँचते ही दौड़ा-दौड़ा पूछताछ केंद्र पहुँचा तो समय सारणी में अपने ट्रेन के स्थिति जानने के लिए उत्सुक था, लेकिन ये क्या ट्रेन लगभग ढाई घंटे देरी से पहुँचने की संभावना बता रहा था । रात का सफर वैसे भी बोझिल होती और ऊपर से ये इंतजार की घड़ी । समय काटे नहीं कट रही थी और कुछ सुझ भी नहीं रहा था की क्या करू तो झपकी भी आ रही थी लेकिन अपने आपको जगाये रखना जरूरी था और इसलिए प्लेटफार्म पर घूम रहा था ।

मैं बार-बार ट्रेन की स्थिति जानने के लिए व्याकुल था लेकिन ट्रेन अब तीन घंटे देरी से आने की संभावना की उद्घोषणाहोने लगी । ट्रेन लगभग तीन घंटे की देरी से आ चूँकि थी । सांस में जान आयी क्योंकि घर जाने की बात जो घर से दूर रहते हैं वहीं मेरी बेचैनी समझ सकता हैं ।

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

ट्रेन लगभग तीन बजे स्टेशन पहुँची, अपने कोच में चढ़ने की बेसब्री मुझे व्यग्र कर रही थी कि कब ट्रेन रूके और मैं चढ़ जाऊ । कुछ पल में ट्रेन रूकी और मैं अपने कोच में चढ़ गया, रात का समय होने के कारण मुझे अपनी सीट ढूँढने में थोड़ी परेशानी भी हुई लेकिन चंद मिनट में जैसे ही अपने सीट पर था और इतनी तेज नींद आ रही थी कि सीट पर पहुँचते ही मैं लूढक गया, मुझे कब निद्र देव ने कब अपनी गोद में सुला लिया पता ही नहीं चला ।

पता नहीं कितने बजे थे लेकिन लोगों के आवाज ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया था । इतना शोर-गूल होने के कारण मुझे झल्ला कर उठना ही पड़ा । उठकर खिड़की से बाहर देखा तो कोई बड़ा देखने में लग रहा था, पूछने पर लखनऊ स्टेशन पहुँचने की सूचना मिली इसका मतलब ट्रेन अब और लेट हो गई थी ।

मेरी सीट ऊपर थी और जिस कमपारटमेंट में मैं था वहाँ बैठे लोगों के बात करने के तरीके से सभी एक ही परिवार के लग रहे थे शायद किसी जगह से घूम कर लौट रहे थे । उनके साथ उनका जत्था साथ चल रहा था जो कि इसी कोच में लेकिन कुछ दूरी पर था । ये बाते उनलोगों के बात करने से पता लग रही थी । ट्रेन हर छोटे-बड़े स्टेशन पर रूकने के कारण और लेट ही होती जा रही थी, लखनऊ आते-आते लगभग पाँच घंटे लेट हो गयी थी । ट्रेन लखनऊ से निकल चूँकि थी, इसी बीच मैं भी फ्रेश होने के लिए चला गया । फ्रेश होने के बाद मैं भी कुछ देर नीचे वाली सीट पर ही बैठने की सोच रहा था कि मेरी नजर खिड़की की तरफ चली गई । खिड़की के बाहर हरा-भरा खेत-खलिहान लह-लहा रहे थे । तभी वहाँ बैठे हुए में किसी ने मेरा ध्यान भंग करते हुए मुझसे पूछा आप तो रात में चढ़े होंगे तो मैंने प्रति उत्तर में हाँ में सिर हिला दिया । फिर ट्रेन के लेट होने पर बात शुरू हुई । मेरे साथ बैठे सभी लोगों में से एक ही इंसान था जो कुछ नहीं बोल रहा था बस बाहर के दृश्य का आनंद ले रहा था बस कभी-कभी मुस्कुरा कर बाहर निहारने लगता । नींद पूरी ना होने के कारण मुझे नींद आ रही थी तो मैं सोने चला गया, कुछ देर सोने के बाद अचानक नींद में ही आँखें खुली तो....

क्रमशः

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

-------------------------------------------------------------------------------------------------


राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-२८/१०/२०१६
Share:

Sunday, 16 October 2016

"स्वपनिल सच"

लघु कथा सं-४
शीर्षक-"स्वपनिल सच"~~~

-------------------------------------------------------------------------------------------------

आॅफिस से मीटिंग के लिए निकला ही था कि सहसा ही एक अंजाने मोबाइल नंबर से काॅल आ गई, उसकी आवाज पहचानी सी लग रही थी मगर उसका नाम याद नहीं आ रहा था । उसने कहा सर मैं आपकी छात्रा नरगिस, मेरा सलेक्शन यू.पी-पी.सी.एस में हुआ और शिवा का बैंक में और सब भी प्राइवेट कंपनी में अच्छे पोस्ट पर कार्य कर रहें हैं । मैंने पूछा मेरा नंबर कहा से मिला एस.डी.यो मैडम, तो उसने बोला सोशल साइट से सर । मैंने कहा चलो अच्छा हैं कम से कम सोशल साइट से कुछ का भला तो होता हैं आज अपने विद्यार्थीयों के बारे में अच्छा सुनने को तो मिला । मैंने उसे फिर शाम में फोन करने की बात बोल कर फोन काट दिया और कार में बैठ गया, और ड्राइवर को होटल ड्रीम स्पार्क चलने को बोल मैं सहसा ही पंद्रह (15) साल पहले कि दूनिया में चला गया ।


क्लास से निकला ही था कि बालकनी से प्राकृति की गोद नन्हें-नन्हें बच्चों की चह-चहाहट सुनाई पड़ी । कौतूहाल भरी नजर से जब पूरे नजारा को देखा तो मन में उमंगे उमड़ने लगी । खुले आकाश में कुछ बच्चों की टोली को जो दो लड़कियाँ पढ़ा रही थी, देखने में अच्छे घरों की लग रही थी । मैं उनके नजदीक पहुँचा तो उनके सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य कि प्रशंसा करने से अपने आप को रोक ना सका । 

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

जब उनसे उनके बारे में पूछा तो थोड़ी हिचकिचाहट के बाद दोनों ने अपना नाम बताया, एक का नाम शताक्षी बी.टेक (तृतीय वर्ग) तथा दूसरे का नाम निदा बी.एसी (द्वितीय वर्ष) में पढ़ रही थी । उनके मन में बच्चों को पढ़ाने की बात में कैसे आइ मैंने जैसे ही पूछा तो उन दोनों ने बताना शुरू किया- लंच टाईम में हम दोनों छात्रावास के लिए निकले ही थे कि इन बच्चों की गेंद निदा को लग गयी तो सभी बच्चें माफी माँगने दौड़े चले आये । चोट मामूली थी, उन लोगों को पास बुलाया और प्यार से पूछा तुम लोगों हर समय बस खेलते ही, पढ़ने का मन नहीं होता । तो उनमें से सबसे छोटा जिसका नाम दारून था ने कहा पढना तो चाहता हूँ मगर कोई पढाने वाला नहीं हैं, तो निदा ने पूछा हम दोनों यदि आज सए पढाना शुरू करें शाम को तो पढ़ोगें सब ने हाँ में सिर हिला दिया । उसके बाद बच्चों के पढ़ाने का स्थल, बोर्ड और बच्चों के बैठने की व्यवस्था की इसमें उतनी परेशानी नहीं हुईं । धीरे-धीरे दूसरे बच्चे भी देखा-देखी पढ़ने आने लगे जो से बढ़ता ही जा रहा हैं । अब तो रोज का रूटिन हो गया हैं क्लास खत्म होने के तुरंत बाद हम दोनों बच्चों को पढ़ाते हैं । बच्चें इतने जिज्ञासु हैं कि खेल की जगह पढ़ाई को तरजीह दे रहे हैं और ये बाते उन बच्चों के आँखों से साफ झलक रहा था । जिन बच्चों को वो लोग पढ़ाती थी वो कोई और नहीं बल्कि जिन्होंने अपने खून-पसीने से हमारे कॉलेज को बनाया था वो उन मजदूरों के बच्चे थें । इतना सब कुछ सुनने के बाद कौन भला अपने आपको रोक सकता हैं मैं भी नहीं रोक सका, उनसे मैंने मुहिम से जुड़ने की इच्छा जाहिर कर दी, तो उन्होंने मेरी इच्छा का आदर करते हुए सहर्ष इस बात को स्वीकार कर लिया । अब जिस-जिस दिन मेरी क्लास होती मैं उस दिन पढ़ाता और बाकी दिन वो दोनों । धीरे-धीरे और भी बच्चें इस मुहिम से जुड़ते गये, अब बच्चें भी पहले से बढ़ गये और पढ़ाने वाले भी लेकिन एक चीज नहीं बदली वो थी उन दोनों लड़कियों की ज़िम्मेवारी, क्लास शुरू होने से लेकर अंत तक उन्हें रहना होता था जो कि उनहें थका देती थी । ये बाते मैं समझ रहा था और इसलिए जिस दिन मैं पढ़ाने पहुँचता उनको निश्चिंत होकर छात्रावास जाने को कहता, अब वो मेरे पढ़ाने के दिन मन होता तो रूकती नहीं तो छात्रावास । वैसे भी मुझे बच्चों को पढ़ाना अच्छा लगने लगा था, समय का पता ही नहीं चलता था मन होता था जितना हो सके उनके साथ जी लू ये पल । अब हमारी चिंता इस बात को लेकर थी कैसे इन बच्चों का नामांकन किसी विद्यालय हो जिससे ये आगे की पढ़ाई जारी रख सके । अचानक से एक दिन दैनिक समाचार पत्र के पत्रकार इंटरव्यू लेने आ गये जब शताक्षी और निदा पढ़ा रही थी । अगले ही दिन हर जगह इनके ही चरचे थे, ये बाते हमारे कॉलेज के रजिस्ट्रार सर ने भी सुनी तो खुश होकर उन्होंने नये सत्र शुरू होते ही बच्चों का किसी अच्छे विद्यालय में नामांकन करवाने का वादा किया । अब हमारा ग्रुप पहले से ज्यादा जी-जान से लग गया, सत्र शुरूआत होते ही रजिस्ट्रार सर ने उनबच्चों का नामांकन करवा दिया, अब हमारी ज़िम्मेवारी और बढ़ गई थी । क्लास टेस्ट हमारे सभी बच्चों ने अच्छा किया सिवाय शिवा के जो कि पढ़ने में तो होशियार था मगर बड़ा वाला ड्रामेबाज था । आने वाले परीक्षा के लिए हमलोगों ने अभी से कमर कस ली थी इस बार हर वर्ग में अपने बच्चे १-५ में लाने हैं । परीक्षा शुरू हुए इस बार बच्चों के पेपर पहले से बढ़िया जा रहें थे । परीक्षाफल आ गई, इस बार नरगिस और शिवा ने अपने-अपने वर्ग में प्रथम, सलीम और मुनी अपने-अपने वर्ग में क्रमशः द्वितीय एवम् तृतीय तथा और बच्चें भी अच्छे नंबरो से उत्तीर्ण हुए हम सब बहुत खुश थे । हमारे भी कोर्स पूरे हो गये थे अब हमारे जाने का समय आ चुका था ना चाहते हुए भी हमें जाना पड़ा । हमलोग अपने कैरियर बनाने में लग गये लेकिन कभी-कभी उन बच्चों से बात हो जाती थी । वो लोग दिन प्रतिदिन पहले से बेहतर होते गए ।

आज पंद्रह साल बाद, शताक्षी और निदा के द्वारा लगाये गए छोटे पौधे ने फल देना शुरू कर दिया था, ये हमारे सपने को साकार होने जैसा था । आज उन सब बच्चों के साथ हम लोगों द्वारा गाया जाने वाला गीत "हम होंगे कामयाब एक दिन" सफल होता प्रतीत हो रहा हैं ।

हम होंगे कामयाब एक दिन,
होगी शिक्षा सब के पास एक दिन ।


#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-१३/१०/२०१६
Share:

Friday, 14 October 2016

"रक्त की जुबानी"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"रक्त की जुबानी"~~~

-------------------------------------------------------------------------------------------------


प्रणेश की अहले सुबह आँखें खुली नहीं थी कि पता नहीं कौन जोर-जोर से दरवाजा खट-खटा रहा था, आँखें खोलते नहीं खुल रही थी । जैसे-तैसे उसने दरवाजा खोला तो तरवेज को सामने पाया । बिना कुछ कहे वह अंदर सरपट दौड़े चला आया और बिना पूछे ।

हड़बड़ाहट में अपनी बात बोलने लगा कि मकान मालिक की पत्नी रामजानकी अस्पताल के आइ.सी.यू में भर्ती हैं । अभी तक ४ बोतल खून चढ़ चूका हैं डाक्टर अब भी ३ बोतल की सख्त जरूरत बता रहे हैं क्या तुम खून दे सकते हो । मैं प्रणेश का रूमि था, मैं भी वही था मैंने तपाक से पूछ डाला प्रणेश का खून तो हिन्दू वाला हैं क्या यहाँ के धर्म के नाम पर कट्टरता फ़ैलाने वाले नेताओ को इससे कोई परेशानी नहीं होगी, तो वो कुछ बोल नहीं पाया ।


LIKE US @  http://www.facebook.com/kahaninaama

प्रणेश एक अच्छे दिल वाला इंसान था वह खून देने को तैयार हो गया वो भी तब जबकि वह कल व्रत में था, और उससे भी बड़ी बात ४ दिन बाद उसके सेमेस्टर एग्जाम शुरू होने को थे । प्रणेश मेरा रूमि होने के साथ-साथ एक अच्छा दोस्त भी था, मैंने उसे मना भी किया कि ये पागलपनती हैं एग्जाम सर पर हैं और तुम को इस बात कि फिक्र ही नहीं । उसने बस मुस्कुरा दिया और अस्पताल के लिए निकल पड़ा, शायद ये मानवता के लिए जरूरी था ।

प्रणेश का खून, मकान मालिक की पत्नी से मिल गया डॉ अपने का
में ये और बिना कोई देरी किये डॉक्टर ने खून चढाना शुरू कर दिया । खून चढते ही मकान मालिक की पत्नी की हालत में सुधार होने लगा और अब वह पहले से बेहतर महसूस कर रही थी । लेकिन खून चढ जाने के बाद भी प्रणेश से कोई उसका हाल-चाल पूछने नहीं आया, लेकिन इससे वह तनिक भी दुखी नहीं था अपितु वो खुश था कि उसने अपना कर्म किया हैं 

उसका ये मत था कि खून दान में दिया जाता हैं और वो जिसे दिया जाता उसका रोम-२ उसके लिए कृतज्ञता का आभास कराता हैं । हफ्ते दिन बाद पता चला मकान मालिक की पत्नी के हालत में तेजी से सुधार हो रहा था, अब वह चलने भी लगी थी इधर प्रणेश के एग्जाम भी अच्छे हो रहे थे । खुश था वह अपने जीवन से, बस यहाँ की धार्मिक कट्टरता से परेशान था ।


यह शहर उसे हर वक्त परेशान करता था, इस शहर में कब क्या हो जाए किसी को कोई खबर नहीं होती । यहाँ हर कोई एक-दूसरे धर्म के खिलाफ खून बहाने को तैयार हैं लेकिन अपनों के लिए किसी के पास खून ही नहीं था जिस्म में । लहू "जात-पात, पंथ" नहीं देखता उसे तो बस अपने समूह का साथ मिलना चाहिए, समय पर साथ मिल जाये तो मुरदे में जान ला दें । लेकिन वाह रे भगवान तेरे ही बनाये लोग तेरे नाम पर एक-दूसरे के खून के प्यासे । हे प्रभु ! तूने कैसी दूनिया बनायी हैं, यहाँ खून की एहिमियत लोगों को तब तक समझ में नहीं आती जब तक किसी अपने को लहू की जरूरत ना हो ।


#HINDI #SHORT #STORY


#मिथिला #मचान 

-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- ०७/०६/२०१६
Share:

"अध-कच्चा प्यार"

लघु कथा सं-
शीर्षक-"अध-कच्चा प्यार"~~~ 

-------------------------------------------------------------------------------------------------

वैशाख की दूपहरिया में आँख लगी ही थी कि पड़ोस से बिलखने की आवाजें आ रही थी । बाहर निकला तो पता चला निरूपमा नहीं रही, शायद हृदय से जुड़ी को बीमारी थी उसे जैसा कि लोगों ने बताया । भली-चगी तो थी आज सुबह तक अचानक? प्यारी सी नटखट लड़की, उम्र भी कोई ज्यादे नहीं 22-23 वर्ष की रही होगी । माँ ने बताया "इस बीमारी में कब क्या हो जाएँ कुछ पता नहीं, भूकंप जैसी कहानी हैं इस बीमारी की" । दाह-संस्कार के बाद पता चला, उसकी मँगनी भी हो चुकी थी अगले महीने शादी होने वाली थी लड़का किसी कंपनी में सुपरवाइजर था दिल्ली में । शादी की तैयारी घर में ज़ोर-शोर से चल रही थी, अचानक ये हादसा एक झटके में खुशी के महौल को गम में बदल दिया । वैवाहिक निमंत्रण-पत्र भी छप के आ चुकी थी बस बाकी था तो भेजना । 

सबसे बड़ी बात जो पता चली गुप्त सूत्रों से, वो ये कि वह किसी लड़के से प्यार करती थी और उससे ही शादी करना चाहती थी लेकिन बताने में देर कर दी और घरवाले समझ नहीं पाये । उसके मरने से घर की इज्जत गई वो अलग, पुलिस ने पैसे लिए वो अलग । किसी से प्यार करना अच्छी बात मगर जान देकर, अपने घरवाले से प्यार करने वाले अचानक युवावस्था में प्रवेश करते ही किसी को अपनी दुनिया समझ बैठते हैं और बेवकूफी तो देखो उस दुनिया को पाने के लिए दुनिया ही छोड़ देते हैं । 


LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama

दो दिन बाद ही घर में सब सामान्य हो गया, किसी को उसकी बारे में बात करना तो दूर नाम सुनना भी दूभर था । अपने फैमिली से जीत ना सकी लेकिन जिंदगी की जंग तो खुशी-खुशी जीत ही सकती थी । अपने लिए खुशी को पाने के और भी तरीके, शायद निरूपमा ये बात जान ना सकी । कुछ दिनों बाद उसकी माँ रास्ते में अकेले मिली, बात करते-करते अनायास ही निरूपमा की बात आने पर रोने लगी कहने लगी उसने अच्छा नहीं किया एक आवारे लड़के के लिए हमारा नाम घिना दिया । जिस लड़के से उसकी शादी होनी थी, वो सरकारी नौकरी में बड़ा बाबू के पद पर था, घर से भी संपन्न और तो और लड़के वालों ने ही उसे पसंद किया था ।

उसे शादी उस लड़के से नहीं करनी थी पहले बता दिया होता, उसके पापा को मैं मना लेती । मगर उसने तो मेरे कोख को ही बदनाम कर दिया, हर कोई मुझे ही उसके किये के लिए ज़िम्मेवार मानता हैं । उसके पापा उस घटना के बाद उसकी माँ का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते । माँ ने अपनी बेटी को बेटे के समतुलय लाड़-प्यार दिया था, मोहल्ले की लड़कियाँ भी ऐसी माँ अगले जन्म पाने की लालसा रखती थी, उसकी इस बेवकूफी के लिए हर कोई उसकी माँ को ही तो जिममेवार मानेगा । घर आया, मुँह-हाथ धोने गया तब तक माँ खाना ले आयी ।


थके होने के कारण जल्दी-जल्दी खाया और लेट गया, आज की बातों को याद करने लगा । सहसा ही निरूपमा के माँ द्वारा कही बात याद आई, एक माँ के संवेदना को कोई समझ नहीं सकता बेटी के गुजरने पर रो भी नहीं सकती । किसी गुजर चुके मनुष्य की एक छोटी सी गलती कितनों की जिंदगी में कड़वाहट ला सकता हैं वो इस घटना समझ में आया ।


#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

-------------------------------------------------------------------------------------------------

राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक-२७/०४/२०१६
Share:

"स्टेशन तक"

लघु कथा सं-१
शीर्षक-"स्टेशन तक"~~~

-------------------------------------------------------------------------------------------------

बात पुरानी हैं, ऑफिस के काम से पटना जाना हुआ था । पूरे दिन दौड़-भाग के बाद शाम को अन्न नसीब हुआ वो भी सिर्फ "समोसे"। रात को बिस्तर पर जाने के बाद कब आँख लग गयी पता ही ना चला । लोगों से जैसा पटना के बारे में सुना था उससे कुछ हटके था पाटलिपुत्र । सुबह उठते ही नाश्ते में लिट्टी-चौखा खाने को मिला, मुँह में पानी आ गया "जबरदस्त" चटपटा । दोपहर होते-होते ऑफिस का काम निपट चुका था, रात को मेरी ट्रेन होने के कारण मुझे कोई जल्दी नहीं थी । पैदल ही होटल के लिए निकल पड़ा इससे पटना को दिल के करीब से देखने का मौका भी मिला गया था । मैं गाँधी मैदान होते हुए होटल के लिए चल पड़ा जो कि स्टेशन के करीब ही था ।

पटना के ऐतिहासिक चीजों को देखकर मैं इतना अभिभूत था कि कब मैं हम-उम्रों टोली के बीच जा पहुँचा पता ही ना चला । इस बीच उसी टोली में दो आँखें कब अपनी हों गई पता ही ना चला, सब कुछ इतनी जल्दी घटित हो रहा था कि कब एक अनजान सा चेहरा अपना हो गया, समझ में ही नहीं आया । वो मेरे करीब थी और उसने पूछा आपको तो अपने ग्रुप में कभी नहीं देखा, मैंने हँसते हुए कहा तुमसे ही मिलने आया हूँ मजाक में  उसके साथ हल्की-फुल्की बातें करते हुए कब मेरी मंजिल आ चुकी थी पता ही नहीं चला, उसने अपनी हल्की मुस्कान के साथ अपना मोबाइल नंबर देते हुए मुझसे विदा लिया ।

LIKE US @ www.facebook.com/kahaninaama/

शाम हो चूँकि थी, मुझे होटल से स्टेशन को निकलना पड़ा, थके होने के कारण कब मैं ट्रेन में सो गया।  दिल्ली पहुँच कर मैं अपने लाइफ में बिजी हो गया, धीरे-2 समय बितता गया अचानक छुट्टी के दिन डायरी से एक पुरजी निकली अचानक ध्यान आया तो मैंने फोन घुमा दिया रिंग होने लगी, उधर से प्यारी सी आवाज आई -हौलो, कौन? मेरे मुँह से बस हल्की सी आवाज निकली "आपका अनजान फ्रेंड" । उसने बोला पहचाना नहीं , मैंने बोला भीड़ में जिसे "आपने अपना समझा" । उसने बोला ओह मैय गाॅड आप इतने दिन बाद कैसे हैं क्या हो रहा हैं और सबसे महत्वपूर्ण सवाल आपका शुभ नाम? बहुत देर तक देर बातें होती रही और उस दिन से हमारी रोज बातें होने लगी और  धीरे-2 हम अच्छे दोस्त बनें, एक-दूसरे से अपने प्राबलम शेयर करते, उसे सुलझाते ।

आज भी 20 साल बाद भी हम दोनों अच्छे दोस्त हैं,  पंद्रह साल पहले मेरी शादी हो गई एक प्यारी लड़की से जिसके लिये मैं ही उसकी दूनिया हूँ और मेरे लिये वो । जिस कॉलेज में वो पढाती थी, आज वो उस कॉलेज की प्रिंसिपल हैं और मैं सफल उद्योगपति । वो मेरे कंपनी की निर्णायक मंडल की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य हैं आज तक उसने जो भी सलाह कंपनी को दी उसने कंपनी को ऊँचाई को छूने के और करीब पहुँचाया ।

#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान 

-------------------------------------------------------------------------------------------------


राम "मैथिल"
दरभंगा, मिथिला (बिहार) ।
दिनांक- ०४/०४/२०१६
Share: